Wednesday, December 26, 2012

मेरा घर गली के अंतिम 
छोर पे है 
हर रोज़ मैं गली 
पार कर के स्कूल जाती 
हूँ 
हर रोज़  घर से निकलते 
वक़्त मैं एक 
छोटी सी दुआ मांगती हूँ 
कि -
   कल जब मैं ये गली 
   पार करूँ तो 
   मेरी आंखें ज़मीन 
   को देखते हुए 
   नहीं बल्कि 
   आकाश में उड़ते 
   पक्षियों का पीछा करें 
  और मेरा दुपट्टा 
  मेरी सुरक्षा नहीं 
  बल्कि मेरा पंख बन जाये ........
   
  

Thursday, November 15, 2012

क्यूँ थक हार जाता हूँ मैं 
     जब जब देखना चाहा मैंने 
     सागर आकाश धरती 
     पहाड़, सूरज, चाँद 
     फ़ूल और तारों 
     से बहुत दूर कुछ और .....
क्यूँ खोने लगता हूँ मैं 
    जब-जब पाना चाहा मैंने 
    यश, नाम, धन 
    सफलता, धीरज, ख़ुशी 
    और उम्मीद की 
    सीमाओं से परे कुछ और .....
क्यूँ टूटने लगता हूँ मैं 
   जब-जब तोड़ना चाहा मैंने 
   नियम, काएदे , उसूल 
   बंधन, जेल, और समाज 
   की ज़ंजीरों से भी मज़बूत कुछ और ....
           क्या इतना कमज़ोर है जीवन 
           जो रह -रह कर बिखर जाता है?
           या फिर इतना तथस्ट की 
           सब कुछ हार कर भी 
           जीत लेता है जीवन से भी 
           उज्जवल कुछ और ..........
   

    

Tuesday, November 6, 2012

चाँद धीरे-धीरे बादलों 
के पर्दों के पीछे से 
निकल रहा था 
ठीक उस वक़्त जब 
सूरज की कुछ अंतिम 
किरणे सिमट रहीं थी 
उन्ही पर्दों की सिलवटों 
में--
और कहीं किसी आंगन 
में कुछ बच्चे खेल खेल में 
चाँद में अपने मामा को बुला 
रहे थे.... 
वहीँ कहीं 
कुछ दूर उस अँधेरी 
गली के मोड़ पे 
बसे बस्ती में कुछ 
बच्चे चाँद में रोटियों 
की कल्पना करते करते 
निष्ठुर रात की 
गोद में सो रहे थे
    पर उनके सपनों में 
   शायद सूरज की सुनहली 
  किरणे अब भी जाग रही थीं ..........

     
         
       

Thursday, October 18, 2012

क्या पता ....

अच्छा है की तुम ये 
बाज़ार काला  चश्मा 
लगा कर देख रहे हो 
उसकी धुप छाँव वाली रौशनी 
में तुम एक सुनहली दुनिया 
की तस्वीर की कल्पना कर रहे हो ....

       वरना क्या पता तुम भी एक 
       आतंकवादी करार कर दिए जाते 
       अगर चश्मा हटाकर तुमने 
       बदलते दौर का दृश्य 
       खुली आँखों से देखा  लिया होता! 
       और तुम्हारी बेचैन रूह ने 
       तुम्हे जंग के लिए 
       तैयार कर दिया होता .!!........
   
\         

       
      
    
             
   

   

Tuesday, October 16, 2012

पोस्ट बॉक्स का लाल डब्बा 
मुड़ते सड़क के ठीक कोने 
में तीन चार फूट लम्बी उग आई  घास-फूस 
के झुरमुटों से उदास आँखें लिए 
झाँक रहा था और तभी 
मैंने उसे देखा जब 
तेज़ भागती उस सड़क के दूसरी 
ओर खड़ी 
मैं किसी का  
पता खोज रही थी
उसकी गहरी काली आँखों का 
सवाल मेरा जवाब बन के आया 
         मुझे याद आया उस दोस्त 
        का पता जिसकी 
        चिट्ठियों का जवाब देने का 
        वक़्त मैं आने वाले दिनों 
        पे टाल कर आज 
        सुबह घर से निकली थी........

       

Saturday, September 22, 2012

कल रात ख्वाब को 
सितारों की सीढ़ियों 
पे चढ़ते देखा था 
धीरे-धीरे उसे 
चाँद की खिडकियों 
तक पहुँचते देखा था --
       ----सुबह अख़बार में 
             यही खबर थी 
             की चाँद की चोरी हो गयी।
              
   
   

Friday, August 17, 2012

वो कहना चाहता 
था किसी से--
जुबां पे जो बात 
आकर रुकी थी
वो दिखाना चाहता 
था किसी को --
जज़्बात जो ह्रदय 
के सिरहाने सो गए थे 
वो थिरकना चाहता 
था किसी के साथ--
उन धुनों पे 
जो शब्दों में उलझ 
गए थे 
वो मनाना  चाहता 
था किसी को --
देकर कुछ ख्वाब 
जो मिट कर 
तारे बन गए थे
वो पिरोना चाहता 
था किसी के लिए--
हार जिनके मोती 
सागर की गहराईयों 
में जा छुपे थे 
वो चलना  चाहता था 
किसी को लिए ---
उन बादलों पे 
जो घटायें बन 
बरस चुके थे.....
         
        
         


Monday, August 13, 2012

बहुत दिन गुज़र गए 
आईना देखे हुए 
आज जब रूबरू हुए 
खुद से 
तो आईना न देखने 
का अफ़सोस नहीं था 
नज़रों को क्यूंकि---
मैं की छवि में 
छींटे थे लहू के 
उन मासूम जज्बातों के 
जिनका क़त्ल किया था 
मैंने दिन दहाड़े 
बस एक उन्माद और 
झूठी नफरत में 
सने खंजर से ......
      अपनी हस्ती को देख 
      मैं हैरान हूँ 
     चौराहे पे हर किसी से 
     कहता फिरता हूँ   
     की मुझे गौर से मत देखो 
     कि मैं एक आईना हूँ 
     जिसमे हर शक्ल एक 
     हैवान  ही नज़र आती है....
   

Tuesday, July 31, 2012

i took a long
road in the rains
under the shade of my 
umbrella,
in refuge of the words 
of a song ringing softly in 
my ears....
i followed the caravan of 
wet pebbles and grasses 
leading me to nowhere
but it recorded my walk
on the swollen mud paths
......i wish another spell of 
      rains don't wash away 
      the memories stored 
      in my footmarks!!!
       

Tuesday, July 10, 2012

उठो !!
        कि वक़्त कम है 
        जीने का 


देखो !!
         कि ख़त्म हो रही 
         है सुन्दरता 


चलो !!
         कि बढ़ रहीं है 
         दूरियां 


संभलो !! 
            कि हर डगर पे 
            लगे हैं गति-रोधक 


छू लो !!
           कि सुना है तारे 
           ढूंढ रहे है नया असमान 


थाम लो !!
               कि रिश्तों में 
               आ रही है खटास 


ढूंढ लो !!
             कि कल शायद 
             न मिले कोई एहसास।.......

Sunday, June 10, 2012

मेरी आँखों में 
रौशनी नहीं पर 
मेरे मन में अंधकार नहीं 
मेरे पैरों में हरकत नहीं 
पर मेरी हिम्मत कम नहीं 
मेरी  आवाज़ में गूँज नहीं 
पर मेरे जज़्बात बेज़ुबां नहीं 
मेरे कान सुन सकते नहीं 
पर मैं शोर से अनजान नहीं 
         घेरती हैं काली घटाएं मुझे भी 
         बरसात की बूंदों में भीगता है 
         मेरा आँचल भी 
         सूर्य की  किरणों से मिलती 
         है रौशनी मुझे भी 
         चाँद और तारों से बातें 
         करता हूँ मैं भी 
         हवाएं देती हैं एहसास 
         परों के होने का मुझे भी
         सपनों की सुनहरी दुनिया 
         बसती है मेरी आखों में भी....
                       ये सब ही तो करते हैं मुझे पूर्ण 
                       इनकी छाया में हूँ मैं महफूज़.....
                    

Thursday, May 31, 2012

उस  शहर में अब  सिर्फ  
वीरान  राहें  हैं 
सुनसान  घरौंदे हैं 
मूर्छित  पेड़ पौधे हैं 
धुंध  ही धुंध है चारों ओर 
जाने किसने इसकी 
आत्मा को इस  कदर 
कुचला है ...
सूने बचपन के कमरों
में हज़ारों बच्चे उम्र  कैद हैं
जाने किसने इनके
सर पे छाये  नीले आसमान
की छतरी को छीना है...
सूनी-सूनी सी है
हर डगर
दर-दर पे डर अपने
डैने फैला कर बैठा है
किसने शहर की हर
दरों-दीवार को खून
से रंग  दिया है?? 
        कल रात यहाँ नफरत कि 
       आंधी आयी थी 
       ऐसी घृणा भरी हवा 
       जिसने इंसानीयत की
       रूह में घर कर 
        हर ख़ूबसूरत जज़्बात को 
        ज़हर बना दिया...
             शायद यही हवा है 
             जिसने शहर को 
             मरघट सा बना दिया है.....
     
 
   
   



Wednesday, May 16, 2012

मुझे एक  उम्मीद चाहिए कि--
       कल जब मेरी आँखें
       खुलें तो इनमें बुझे हुए से 
       ख्वाबों की कोई खिर्चन न हो
       मेरे कदमों में 
       जैसे जंजीरें बंधी हों 
       ऐसा कोई एहसास न हो
       मेरे हथेलियों में 
       खिंची रेखाओं की 
       टेढ़ी मेढ़ी गलियों में 
       सन्नाटों की सांय-सांय करती 
       कोई आवाज़ न हो...
                मुझे एक उम्मीद चाहिए जो हुबहू--
                  रौशनी, हवा, पानी 
                  तितली, फूल, बादल 
                  और सौंधी मिट्टी की 
                  खुशबू सा हो .....
        

Saturday, May 12, 2012

कुछ खयाल जो---
किसी चित्रकार
की आड़ी तिरछी रेखाओं में 
रंग बन कर उभरें या 
किसी कवि कि रचना में
शब्दों कि मंशा बनकर खिलें 
---- क्या मुमकिन है 
     ऐसे खयाल यूँ ही मिलें
    और  फ़िर 
    उम्र बन कर साथ साथ चलें !!

Saturday, April 21, 2012

अब तो दिनों का कोई हिसाब भी नहीं रहा 
जिसे देखकर ये जान सकूँ कि कितना 
वक़्त गुज़र गया है
जब हम अच्छे दोस्तों कि तरह मिलते थे, 
कुछ काम कि और
बहुत सारी बेकार कि बातें करते थे. 
कहाँ कौन से सपने डरा जाते 
और कौन सा ख्वाब ख़ुशी कि दस्तक दे जाता , 
कैसे किसी कि कोई बात मन को बुरी लगती थी, 
तो  किसी का कुछ न कहना अखरता, 
कैसे किसी अपने का जाना दुखी करता 
और किसी का आना विचलित.. 
किसी अपने की छोटी से छोटी 
उलझन को सुलझाने और 
समझने की कोशिश करना , 
फिर किसी बेतुकी बात पे दुखी हो जाना..
चलते -चलते चिड़ियों कि
चहचाहट सुनकर  ठहरना...
कभी- कभी यूँ ही  चुपचाप भी बैठे रहना...
कई -कई दिनों तक न मिलना 
कोई खोज खबर भी न लेना 
और मिल गए अचानक तो सब भूलकर 
साथ चाय पीना---
  ---आज कल और परसों की आपा-धापी में 
    भले ही कुछ हो रहा हो या ना
   पर धुंधलाती होती नज़र में 
   आज भी दोस्ती की उस 
   उम्र पे  चश्में नहीं चढ़े हैं.....

Friday, March 30, 2012

अच्छा लगता है
किसी बिछड़े दोस्त 
का वापस आना 
और उसके साथ 
स्मृतियों की 
गलियों में घूमने जाना 


छोटे-छोटे पलों 
की लम्बी कहानियों 
की किताब से 
अपनी मनपसंद कहानी
साथ पढना 


सपनों के महल 
से गायब हुए कुछ
जुगनुओं 
की तलाश में अंधेरों 
से मिलकर लड़ना...


अच्छा लगता है 
किसी बिछड़े दोस्त 
के साथ जीवन के
बिछड़े समय को 
चाय के प्यालों 
में भरना....








Tuesday, March 27, 2012

स्नेह के लिबास
में उसका मनोरम
मन और भी निखर गया
उसके मुख पे
आई हल्की सी मुस्कान
ने उसके शब्दों
को और भी मीठा किया
काजल के पट पे टिकी
उसकी आँखों में जब 
प्रेम के एहसास ने धीरे
से कदम रखा--
लहरों सी चली आयीं 
भावनाएं 
और उसकी धडकनों
को किनारा दिया.....



Monday, March 19, 2012

कुछ लोग ऐसे भी...

वो पथरीली राहों
से आज कंकर चुन-चुन 
कर हटा रहे हैं
की कल उन रास्तों 
पर हरी दूब और 
रंग बिरंगे फूल खिलें...
वो आज चिलचिलाती
धूप में लाल सलाम
की गूँज की तरफ
कदम से कदम मिला रहे हैं
की कल साम्यवाद 
का एक  स्वर हर मुख पे
सुस्सज्जित हो..
उनके दिलों में आज
एक जूनून की लहर है
जिसे ताकत बना 
वो लड़ रहे हैं 
की कल  हर आवाज़ 
में चुप्पी तोड़ने का 
साहस हो.....



करवट लेते ही 
किसी ख्वाब 
की नींद टूटती है 
कुछ वैसे जैसे ----


किसी ने रफ़्तार 
पकडती रेलगाड़ी 
की ज़ंजीर खींच कर 
उसे बियावान जंगल 
में रोक दिया हो.....


जैसे गंगा के गर्भ
में विसर्जित 
दुर्गा की प्रतिमा 
को पानी में घुलने 
से पहले ही किसी ने 
बाहर निकाल दिया हो...


जैसे चैन से दाने चुगती 
चिड़िया पे बहेलिये 
ने अपना जाल फ़ेंक 
कैद कर लिया हो...


जैसे बंदरगाह के 
करीब पहुँचते जहाज को
बवंडर ने तहस नहस किया हो....
                        













Sunday, March 11, 2012

सोच की आँधियों-तूफानों 
से लड़ता-भिड़ता 
चोट खाता, लड़खड़ाता 
उद्वेलित मन के 
तहखानो के अंधेरों 
को चीरता हुआ पास  
आता है एक ख़याल....
 जो सहमी और डरी हुई सी 
शाम को अपनी रौशनी 
से करता है बेदखल.....
                एक मज़बूत  ख़याल,  जिसकी पेशानी 
                पे   उभरी रेखाएं  कहती 
                हैं हमने उम्र को बूढ़ा होते देखा है
                और सोच को नवीन......


                

Friday, March 2, 2012

बरसात की रात 
मैं कटोरों में काटता हूँ 
चम्मचों में भी 
बूंदों को रोकता हूँ....
चिलचिलाती गर्मी 
मैं फूटपाथ पे काटता हूँ
अपनी कमीज़ 
को पसीने  से धोता हूँ....
सर्दियों की शाम 
मैं सुलगती बीड़ी से काटता हूँ
काठ सी होती हथेलियों को
अपने घुटनों के बीच सेंकता हूँ....
                       आपने बिलकुल ठीक-ठीक पहचाना                        
                       आपकी टूटी छत की जिसने मरम्मत की 
                       वही मजदूर  हूँ मैं.......
                       
                             

Thursday, February 2, 2012

एक आखिरी ख़त 
का पहला वाक्य 
शब्दों के मायाजाल 
में कुछ यूँ उलझा 
की हर शब्द के 
अर्थ बदलते रहे 
एक दूसरे से जुड़ने 
के बाद --

शब्द जिन्हें ओढना 
था सुनहली धूप की चादर
वो टांकते रहे पैबंद
रात के अँधेरे काँटों से तार-तार 
हुए अस्तित्व पर...

शब्द जिन्हें ढलना
था सोयी हुई दूब पर 
ओस की ठंडी बूँदें बनकर 
वो सिमटते गए 
आँखों की टोकरियों में
रात  घुमड़ आये
बादलों की गर्जनों 
से डरकर.....







         
           

Tuesday, January 24, 2012

इक कहानी 
कि बुनियाद पर
सपनो के आशियाने 
बनते रहे
सारे किरदार 
किरायदार बन घरों
में रहने लगे


खबर मिली कि--- 
   मकानों से सटे 
   बिजली के खम्बों
   के  उलझे तारों में
   हर दिन एक 
   पतंग फ़सने लगी
   और -
   उन्हें पाने कि फ़िराक 
   में पड़ोसियों में 
   जंग छिड़ने लगी है .....





मैंने एक शहर देखा 
सागर के किनारों पे ठहरा सा
निरंतर घटती बढती लहरों 
कि धडकनों पे जगता सा---

रेल कि पटरियों पे 
आती जाती ट्रेनों में
लाखों ख्वाहिशों सपनों और 
कच्चे पक्के इरादों से 
भरी बोगियों सा---

असमान से भी आगे 
ले जाएँ ऐसी हज़ारों 
इमारतों तक जाती राहों
पे भागती भीड़ में खोया सा----
                       
                       चमकीली धूप के दुपट्टों
                       में लिपटा सा
                       सर्द हवा के पंखों पे सवार
                       neon lights में 
                       जगमगाता सा 
                       taxi के मीटरों में  
                       भागता सा 
                       
मैंने एक शहर देखा-----
                       
                      



Monday, January 9, 2012

काश
कहने सुनने की
आदत न लगी होती 
तो आज खोने 
का आभास  न होता
स्टेशन पे उमड़ी 
भीड़ में दीखते 
हज़ारों चेहरों में 
कोई चेहरा अपना तो न लगता 
चारो तरफ बिखरे 
शोर में 
इक आवाज़ का दर्द 
मेरे कानों में शीशे सा 
तो न पिघलता......

Friday, January 6, 2012

दूरीयों का एहसास 
होता है -
                  जब घर से निकलने
                  के बहाने कम होने लगते हैं
                  जब रात को तारों
                  से दोस्ती गहराने लगती है
                  जब टेबल पे रखे-रखे
                  चाय ठंडी होने लगती है
                  जब खुश होने का 
                  मतलब एक मुस्कान 
                  भर में ढल जाता है
                  और 
                 जब दो चार  कदमो
                 का सफ़र अपरिचित 
                 गलियों में गुम होने 
                 लगता है........