Friday, December 30, 2011

वक़्त छोड़ता है 
अपने निशान-
                    चेहरों पे उभर
                    आई रेखाओं में
                    शेल्फ में रखी
                    किताबों के पीले 
                    होते पन्नों में
                    देर रात रेडिओ 
                    पे बजते पुराने 
                    गीतों की आवाज़ में
                    दोस्तों को लिखे गए
                    खतों के जवाब के
                    इंतज़ार में.......


            

Thursday, December 29, 2011

रह रह कर 
धूल उड़ाती
आंधियां 
आती तो हैं यूँ
की लगता है 
जड़ों से उखड़ 
जायेंगे कई ज़ब्त
एहसास 
पर-- 
    आंधियां तो गुज़र 
    जाया करती हैं 
    छोड़ते हुए धूल और 
    मिट्टी की परतें 
    और गहरी धस्ती
    जाती हैं वो जड़ें 
और--
      सतह पे खड़े ठूंठ 
      को देखकर हर 
      आगंतुक उसकी 
      उम्र आंकता है 
      अनजान इस बात से
      की कुछ सूखे पत्ते
      उसके कदमों
      तले दबे हैं....
      
      



Monday, December 26, 2011

फ़ोन की 
घंटी बजती है 
और हाथ न जाने 
क्यूँ उसकी 
घनघनाहट सुनते ही 
कोट की जेब में 
होकर भी ठन्डे पड़ जाते हैं
कांपते हाथों से
 रिसीवर को कान से 
लगाकर जैसे ही 
हेल्लो! कहती हूँ 
और मन ही मन 
ये दुआ करती हूँ 
की आज तो 
चुप की आवाज़ 
मुझे सुनाई दे जाये....
     पर---
वही चीरती हुई 
एक गुज़ारिश
फिर उस तरफ से 
     क्या आप होम लोन लेना चाहेंगे!!!!!?????


Saturday, December 17, 2011

मन की दीवारों
पे बढ़ते  दरख्तों 
को देखकर महसूस 
होता है 
जैसे बीतती हुई
उम्र के लम्हों 
से गिरे बीज 
साल दर साल 
मेरे होने के निशाँ 
अपनी जड़ों में
ज़ब्त करते रहेंगे...
बारिश के मौसमों 
में जब भी गीली 
होगी ये दीवार
ये दरख़्त 
बूंदों को यूँ ही सोखते 
रहेंगे--
      इन्हें भी अपने होने का 
      गुम़ा जो है.......

Sunday, December 4, 2011

बादलों के घने 
जंगलों में सपनो 
के ऊँचे ऊँचे पेड़ों 
पर बने घोसलों 
में रख दिए हैं 
मैंने अपने कुछ दिन....
ऐसे दिन -
जिनके पलों ने 
हंसती हुई
आँखों से गिरते 
मोतियों को पिरोया...
ऐसे दिन -
जिसके आँगन में 
गिरती धूप की हर किरण 
ने अँधेरे कोनों को नहलाया 
ऐसे दिन-
जिसके हर ढलते सूरज
चाँद और तारों ने 
यादों को जीवंत बनाया......