Tuesday, June 28, 2011

वक़्त ने कब 
कैसे और कहाँ 
बदल ली थी 
अपनी चाल 
ये इल्म
ही नहीं हुआ...
हाँ ! उसे गुज़र 
जाना ही था 
आज- कल की
आँख मिचौली में
इस बात का 
हर मोड़ 
पे ज़िक्र था....
ये ज़ाहिर नहीं की 
 मैं वक़्त से 
या वक़्त मुझसे 
बचता रहा
ग़म सिर्फ इतना 
है की 
मैं वक़्त को ढूंढकर
अपने दिए उधार
वापस ले न सकी...
ये भी हुआ यूँ की 
वक़्त की सजाई
बिसात पर
मैं एक पैदल बनी
और ठहरी रही........ 




 



Saturday, June 11, 2011

सुबह तक
जागी आँखों
को थोडा और
खोलती हूँ
खिड़की की
ओर कदम
खुद बखुद
बढ़ते हैं
ये सोचते हुए
की शायद
सूरज भी
ओंधे मुंह
पड़ा दिख जाये
कल रात
ही चाँद
के साथ साजिश
की थी
कि सुनहले दिनों
को मुट्ठी में
कैद किया जाये.....

Friday, June 10, 2011

सत्ता की
बिसात
पर जंग
तो जायज़ है
तो क्या हुआ
अगर लहू
बहा...
धढ़ गिरे
हज़ारो निस्तेनाबूत
हुए...
जीत की नुमाईश
के यही
तो साज़ो सामान हैं......!!!
एक झूठ
था
जिसे सौ लोगों
ने कहा
अपना सच
जान कर....
आज वो
झूठ
सच की
कसौटी पे
खरा उतरा है...
आखिर महाभारत
भी तो वो 'धर्मयुद्ध'
था जिसकी
जीत की
नींव को
झूठ की ईंटों
पे सजाया गया.....
ये बात अब
किसी से मत
कहना की
सच झूठ
पे विजयी
होगा....


Tuesday, June 7, 2011

हम किस
और अग्रसर हैं?
ये सवाल
विचलित करता है
हर कदम
पे तो रास्ते
खुदे हुए हैं
और
हर हाथ की
दूरी पर
अँधा राज सरपरस्त है..
जिस आज़ादी
पे कल हमें
फक्र था
आज वो चंद
लोगों की मिल्कियात है ....


Monday, June 6, 2011





वो खामोश थी
उस दिन जब
माँ ने तोड़
दी थी उसकी
कलम
वो खामोश
थी उस दिन
जब उसे सौंप
दिया गया था
अजनबी हाथों
में,
वो खामोश थी
उस दिन
जब जलीं  थीं  
रोटियों की
भांप से
उसकी हथेलियाँ..
वो खामोश थी
उस दिन
जब उसकी
आवाज़ पे
अजनबी ने
लगाये थे
ताले..
वो सिर्फ एक
बार चीखी
जब की
गयी ख़ामोशी
से उसकी
नन्ही भ्रूण की हत्या.....