अब नहीं जाते
हैं कदम
उन राहों
की तरफ
की जहाँ
लगा करता था
अपने से लगने
वालों का मेला.
अब नहीं ढलती
है कोई शाम
ऐसी की जिसके
ज़िक्र में ठन्डे
हो जाया करते
थे चाय के प्याले.
अब नहीं ठहरते
हैं यादों की बस्ती में
की जहाँ चोरी से
पौकेट में
डाल लिए थे
दो चार तारे......
कई बार
सोचा
दो चार
कदम चलकर
बुरे समय
के बाँध
को लांघ जाऊं
पर दुःख
की एक गहरी
नदी
की ठहरी नज़र
ने मुझे
ऐसा करने से
हर बार रोका
है...
कहते सुना-देखा
और इतिहास ने
बयां किया
की नदियों
ने सभ्यताओं को
जन्म दिया
जीवन को
प्रवाह दिया..
पर कुछ तो
हुआ
जो जीवन
की गति
पे अवरोध सा
लग गया
क्या हुआ गलत
इसकी व्याख्या
अभी बाकी है.....