Saturday, April 21, 2012

अब तो दिनों का कोई हिसाब भी नहीं रहा 
जिसे देखकर ये जान सकूँ कि कितना 
वक़्त गुज़र गया है
जब हम अच्छे दोस्तों कि तरह मिलते थे, 
कुछ काम कि और
बहुत सारी बेकार कि बातें करते थे. 
कहाँ कौन से सपने डरा जाते 
और कौन सा ख्वाब ख़ुशी कि दस्तक दे जाता , 
कैसे किसी कि कोई बात मन को बुरी लगती थी, 
तो  किसी का कुछ न कहना अखरता, 
कैसे किसी अपने का जाना दुखी करता 
और किसी का आना विचलित.. 
किसी अपने की छोटी से छोटी 
उलझन को सुलझाने और 
समझने की कोशिश करना , 
फिर किसी बेतुकी बात पे दुखी हो जाना..
चलते -चलते चिड़ियों कि
चहचाहट सुनकर  ठहरना...
कभी- कभी यूँ ही  चुपचाप भी बैठे रहना...
कई -कई दिनों तक न मिलना 
कोई खोज खबर भी न लेना 
और मिल गए अचानक तो सब भूलकर 
साथ चाय पीना---
  ---आज कल और परसों की आपा-धापी में 
    भले ही कुछ हो रहा हो या ना
   पर धुंधलाती होती नज़र में 
   आज भी दोस्ती की उस 
   उम्र पे  चश्में नहीं चढ़े हैं.....

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