Monday, August 13, 2012

बहुत दिन गुज़र गए 
आईना देखे हुए 
आज जब रूबरू हुए 
खुद से 
तो आईना न देखने 
का अफ़सोस नहीं था 
नज़रों को क्यूंकि---
मैं की छवि में 
छींटे थे लहू के 
उन मासूम जज्बातों के 
जिनका क़त्ल किया था 
मैंने दिन दहाड़े 
बस एक उन्माद और 
झूठी नफरत में 
सने खंजर से ......
      अपनी हस्ती को देख 
      मैं हैरान हूँ 
     चौराहे पे हर किसी से 
     कहता फिरता हूँ   
     की मुझे गौर से मत देखो 
     कि मैं एक आईना हूँ 
     जिसमे हर शक्ल एक 
     हैवान  ही नज़र आती है....
   

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