बहुत दिन गुज़र गए
आईना देखे हुए
आज जब रूबरू हुए
खुद से
तो आईना न देखने
का अफ़सोस नहीं था
नज़रों को क्यूंकि---
मैं की छवि में
छींटे थे लहू के
उन मासूम जज्बातों के
जिनका क़त्ल किया था
मैंने दिन दहाड़े
बस एक उन्माद और
झूठी नफरत में
सने खंजर से ......
आईना देखे हुए
आज जब रूबरू हुए
खुद से
तो आईना न देखने
का अफ़सोस नहीं था
नज़रों को क्यूंकि---
मैं की छवि में
छींटे थे लहू के
उन मासूम जज्बातों के
जिनका क़त्ल किया था
मैंने दिन दहाड़े
बस एक उन्माद और
झूठी नफरत में
सने खंजर से ......
अपनी हस्ती को देख
मैं हैरान हूँ
चौराहे पे हर किसी से
कहता फिरता हूँ
की मुझे गौर से मत देखो
कि मैं एक आईना हूँ
जिसमे हर शक्ल एक
हैवान ही नज़र आती है....
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