Tuesday, October 14, 2014

मन पता नहीं कहाँ कहाँ जाता है
कैसी कैसी बातों के बीच
बैठ जाता है
चुपचाप सुनता रहता है
एक मूक आगंतुक की तरह
देर तक। …
जब थकने के कारण
उसकी पलकें झपकने लगती हैं
तो वहीँ निढाल हो जाता है
बातों के बीच की
तंग जगहों में ...
फिर बिन करवटों की
जटिल नींद से झुंझलाकर
उठ बैठता है
तब तक बातें फुसफुसाहट
में तब्दील हो चुकी
होती हैं
मन अपनी उपस्थिति या
अनुपस्थिति से  बेपरवाह
वहां से  निकल जाता है
कहीं और के लिए 

Wednesday, October 8, 2014

पेसोआ की आत्मकथा - 

छंठा अध्याय

ज़िन्दगी से बहुत कम की गुज़ारिश की है और जिंदगी ने मुझे उतने से भी मरहूम रखा है।  क्या चाहा ?-एक छोटी सी जमीं, धुप की एक किरण , थोड़ा सा सुकून और जितने से भूख मिटे बस उतनी रोटी और अपने होने के एहसास तले मैं न दबूं , लोगो से कोई उम्मीद न हो और न ही लोग मुझसे कुछ चाहें या अपेक्षा करें -मुझे ये भी नसीब नहीं, जैसे किसी भिखारी को एक आना भी नहीं मिलता इसलिए नहीं कि लोग स्वार्थी और बेरहम होते हैं पर  इसलिए क्यूंकि उनके अंदर कोट के बटन खोलने की कोई प्रबल इच्छा नहीं जागती। 
अपने ख़ामोशी रवां कमरे में मैं बैठा लिख रहा हूँ, अकेला हूँ यहाँ और हमेशा ही अकेला रहूंगा। मैं सोचकर हैरान होता हूँ की मेरी  नगण्य आवाज़ उन हज़ारों आवाज़ों के मर्म को समाविष्ट करने में सक्षम न हो, हज़ारों ज़िन्दगियों की स्व अभिव्यक्ति की अभिलाषा, लाखों आत्माएं जो मेरी तरह ही रोज़मर्रा के कामों में खोयी  हुई हैं , उनके निरर्थक ख्वाब और उनके निराशात्मक उम्मीदें। इन घड़ियों में मेरी धड़कने बढ़ सी जाती हैं क्यूंकि मैं इन सब उलझनों से अभिज्ञ होने लगता हूँ। मैं ज्यादा जीवित महसूस करने लगता हूँ ,जैसे किसी खुमार में। मेरे भीतर मैं कोई आध्यात्मिक ओज महसूस करता हूँ।  एक दुआ निकलती है किसी हुजूम की चीख की तरह।  पर मेरा ज़ेहन ,तुरंत, मुझे मेरी जगह पे ला पटकता है और मैं खुद को ऊंघती निगाहों से देखता हूँ। मैं इन आधे अधूरे लिखे पन्ने से अपनी नज़र उठा करअपने जीवन को देखता हूँ, व्यर्थ  और किसी भी खूबसूरती से वंचित जीवन, फिर अपनी सस्ती सिगरेट को देखता हूँ जिसे मैं बस ऐशट्रे में  बुझाने ही वाला हूँ इन कागज़ों पे सोखते लफ़्ज़ों में जब्त किसी युद्ध की विवेचना से परे। 
इस चौथे मंजिल पे स्थित मेरे कमरे में मैं जीवन को खंगाल रहा हूँ।  कह रहा  हूँ आत्मव्यथा , किसी मशहूर लेखक या बुद्धजीवी की भाँति कहानी बुन रहा हूँ।  मैं, यहाँ अपूर्व हूँ ......

Friday, October 3, 2014

देखते! देखते !

पूरे एक साल गुज़र गए इस शहर में। मुझे नहीं मालूम कि इस शहर ने मुझे कितना अपनाया है और मुझे इस बात का भी इल्म नहीं कि मैंने इसे कितना आत्मसात किया है इन वक़्तों में। इसके रास्ते अब पहचानने लगी हूँ,
इसके चेहरों से थोड़ा वाकिफ हूँ थोड़ी अनजान हूँ। इसकी हवा में शामिल खुशबुएँ कभी मन हल्का करती हैं कभी शामें बोझिल करती हैं। पहले कभी इतना गौर नहीं किया करती थी और अब करने लगी हूँ। मुझे नहीं मालूम की ये कहाँ तक सही है की जगह के अनुसार लोगों का सामान्यीकरण किया जाये, पर ऐसा करना शायद जल्दबाजी है।  हर जगह अच्छी और बुरी बातें हुआ करती  हैं। हमारे एहसास हमारी परिस्थितियों के मुताबिक बनते बिगड़ते रहते हैं और कई उम्र लग जाती है कोई एक ठोस नजरिया बनाने में। यहाँ कुछ अंजानी परिस्थतियों से मेरा राबता हुआ और उनके कारण मुझे कुछ एक ऐसे लोग मिले जो मुझे बेहद संजीदा और मर्मस्पर्शी मालूम हुए। फिर दूसरी हीं तरफ ऐसे लोगों को भी करीब से देखने का मौका मिला जो जीवन की बहुत सामान्य और मामूली खूबियों से भी मरहूम लगे मुझे , उनमे कड़वाहटों और स्वार्थ की गंध इस कदर मिली की इंसानियत जैसे ख़ूबसूरत लफ़्ज़ पे भरोसा थोड़ा टूटने सा लगा पर टूटा नहीं है और उम्मीद बाकी है :) इस शहर में अपने रास्ते मैंने खुद ढूंढें कभीइ  दोस्तों कभी अजनबियों की मदद लेते हुए, कभी भटकते हुए सही रास्ते मिले हैं और कभी सही रास्तों के भुलावे में अँधेरी गलियों से भी गुजरी।  
कुछ सपनों से छुपकर यहाँ आई थी वो ख्वाब अभी भी पीछे हैं, मेरी तम्मना है उसे उसकी मुस्तकबिल तक ले कर जाऊँ और फिर अलविदा कहूँ इसके पहले कि ये नया शहर पुराना होने लगे मेरे लिए.....