मुझे एक उम्मीद चाहिए कि--
कल जब मेरी आँखें
खुलें तो इनमें बुझे हुए से
ख्वाबों की कोई खिर्चन न हो
मेरे कदमों में
जैसे जंजीरें बंधी हों
ऐसा कोई एहसास न हो
मेरे हथेलियों में
खिंची रेखाओं की
टेढ़ी मेढ़ी गलियों में
सन्नाटों की सांय-सांय करती
कोई आवाज़ न हो...
मुझे एक उम्मीद चाहिए जो हुबहू--
रौशनी, हवा, पानी
तितली, फूल, बादल
और सौंधी मिट्टी की
खुशबू सा हो .....
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