सोच की आँधियों-तूफानों
से लड़ता-भिड़ता
चोट खाता, लड़खड़ाता
उद्वेलित मन के
तहखानो के अंधेरों
को चीरता हुआ पास
आता है एक ख़याल....
जो सहमी और डरी हुई सी
शाम को अपनी रौशनी
से करता है बेदखल.....
एक मज़बूत ख़याल, जिसकी पेशानी
पे उभरी रेखाएं कहती
हैं हमने उम्र को बूढ़ा होते देखा है
और सोच को नवीन......
से लड़ता-भिड़ता
चोट खाता, लड़खड़ाता
उद्वेलित मन के
तहखानो के अंधेरों
को चीरता हुआ पास
आता है एक ख़याल....
जो सहमी और डरी हुई सी
शाम को अपनी रौशनी
से करता है बेदखल.....
एक मज़बूत ख़याल, जिसकी पेशानी
पे उभरी रेखाएं कहती
हैं हमने उम्र को बूढ़ा होते देखा है
और सोच को नवीन......
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