Thursday, June 6, 2013


जिस पल की 

अनकही अनसुनी 
अनजानी डगर 
में यूँ ही कभी कभी 
लड़खड़ाते हुए कदम
लगते हैं गुजरने 

जिस उम्मीद की 

बेपरवाह, बेख़ौफ़ 
बेमानी नज़र 
में यूँ ही हौले हौले 
सुरमई से  ख्वाब 
लगते हैं संवरने 

उस पल, उस उम्मीद 

की चमकीली पन्नी 
वाली पतंग  
आज कट कर 
जा फंसी है बिजली के  
के उलझे तारों में 
अब किसी तरकीब से 
उसे छुड़ाने 

हम ----


भर रहे हैं  चोरी चोरी 

हर दिन थोड़ा थोड़ा 
ज़िन्दगी के प्याले  में 
ह्रदय की नज़रों से बचाकर 
कतरा -कतरा धड़कने ....


Monday, May 13, 2013

बदलते समय में -
प्यार मोहब्बत 
से सरोबार हृदय 
की वेदना 
कोमल जज्बातों 
को रौंद कर 
नफरत में इस 
कदर बदल रही  है 
की बन्दूक की 
एक गोली और 
जीवन के बीच 
का फर्क सिर्फ 
एक पल में 
रफा दफा हो 
रहा है… 

बदलते समय में-
बच्चों की 
मधुर किलकारियों 
उनके निश्छल 
मन की शैतानियों 
उनके उलटे -सीधे 
सीधे- उलटे बचपन 
की नादानियों  को 
भी बाज़ार का  यंत्र 
अपने  चुम्बकीय 
आकर्षण से  खींच 
रहा है 
मदारी के इशारों 
पे नाचते उछलते 
बंदरो की मानिद 
बचपन अब उन्हें 
बड़ों से बड़ा बन ने 
के लिए अधीर 
कर रहा है…. 

बदलते समय में -
इंटरनेट के स्पीड 
गूगल की खोज 
फेसबुक, ट्विटर 
पे इज़हार, ऐतराज़ 
और आंदोलन
आइटम नंबरों की 
धुन पे थिरक रही 
धड़कन
हर जगह खुद को 
आगे रखने 
और औरों 
को धक्का देने 
का प्रचलन 
जुगनुओं की तरह 
लुकछुप  करती 
छणिक खुशियों 
के lollypop का मेहंगा 
बाज़ार चारों 
और सज रहा है…. !!









Tuesday, April 30, 2013



मेरे हाथों 
से न जाने कितनी 
इमारतें ढली हैं 
जिनकी खिडकियों 
से आप चाँद को चुरा  
लेने का दुस्साहस 
बड़ी जिंदादिली से 
कर रहे हैं .....
मेरे हाथों 
ने न जाने कितनी  
पथरीली  राहों 
को तराशा है 
जिनपे दौड़ती 
गाड़ियों में बैठे आप 
हवा से बातें करने 
का दावा कर रहे  हैं .....
मेरे हाथों 
ने न जाने कितने 
धागों को लिबास 
में पिरोया है 
जिन्हें पहन 
आप  रेशमी 
एहसास का लुफ्त 
उठा रहे हैं  ..... 
मेरे हाथों 
ने न जाने 
कितने कोयले की 
खानों में हीरों 
और सोने की 
खनक  को ढूँढा है 
जिनके बाज़ार पे 
आप की चमकीली 
दुनिया खन -खन  
कर रही है .....
मेरे हाथो 
ने न जाने 
कितने खेतों में 
धान रोपा है 
जिसकी उपज 
पे सत्ता के सुल्तान 
अपना हक बेख़ौफ़ 
जता रहे हैं  ........
-निरंतर 
मेरे हाथों 
ने न जाने 
कितने पहाड़ों 
जंगलों, समुन्दरों 
को छू कर 
जीवंत किया है 
जिनकी बाहों में 
झूलते हुए आप
बड़ी चालाकी 
से हमें बेदखल 
कर रहे हैं ......
         मैं फिर भी 
         हाथों में आते 
         पसीने को 
         अपनी फटीं कमीज़ 
         में पोछते हुए 
         अपनी और अपने 
         जैसे लाखों करोड़ों 
         के लिए एक 
         दिन एक नयी दुनिया 
         का निर्माण कर ही लूँगा ......... 
         
          

Monday, April 29, 2013

सड़कों पे, गलियों में 
प्लेटफार्म पे, मंदिरों में 
ठसाठस भरी रेलों में 
बसों में 
आते जाते
अनगिनत चेहरे ही चेहरे! 
छोटे छोटे शरारती 
बच्चों के, 
घर की खटर-पटर से 
फ़ुर्सत लेती औरतों के, 
बॉस की तानाशाही से 
परेशां मुलाज़िमो के,
बेरोज़गारी की मार खाते 
लाखों नौजवानों के,
बुढ़ापे का दर्द झेलते 
नाना नानियों के,
कन्धों पे कुदार का 
भार उठाये मेहनतकशों के,
 कुछ खोये से
 कुछ परेशान  से
 कुछ हँसते हुए
 कुछ मायूस से
 हर दिन हर घडी
 यहाँ से वहां
 कहीं से निकले 
 कहीं को जाते हुए
 चेहरे ही चेहरे!
इन सब अजनबी 
चेहरों को देखकर यही लगता 
है कि -
हर चेहरे की आँखों का पानी
खारा-खारा सा होगा 
हर चेहरे में कोई 
और भी चेहरा कैद होगा 
हर चेहरे की कहानी 
को रचने वाला कोई 
माहिर कलाकार होगा ....

Sunday, April 28, 2013

आज कल ऐसे ख्वाब आते है दबे पाँव,
जिनके आने से आँखों में डर की स्याही
और भी गहरी होती जा रही है
ख्वाब लिख रहें हैं ऐसी कहानियां
जिनके किरदार भी  सहमे सहमे से
फिर रहे हैं चुपचाप सुनसान
गलियों से ढूंढते हुए
अपना घर अपनी पहचान
इनके बेबस दिलों में बैठे  हैं
वो सारे सवाल
जिनके जवाब ख्वाब
ने छुपा कर रखे हैं 
अपनी कहानियों के
शीश महल में
जहाँ पहुँच कर भी 
मुश्किल है रूबरू होना  
जवाबों  से सालों साल 
कि हर जवाब यहाँ आईना है 
जिसके आर पार 
पसरा हुआ है संसार का मायाजाल .......




Friday, April 19, 2013

कुछ ऐसे  भी  
खयाल आते हैं अक्सर 
कि काश ज़िन्दगी की 
अदला-बदली हो सकती 
एक ऐसा भी मेला 
लगता जहाँ
मिलती खूबसूरत  
हंसती मुस्कुराती ज़िंदगियाँ 
हम बदल सकते 
अपना आवरण 
पहन लेते झट से 
एक दूसरा जीवन 
और मेले में 
 छोड़ आते अपनी 
 कुछ रूठी- रूठी 
 कुछ खट्टी खट्टी 
 कुछ टेढ़ी- मेढ़ी 
 कुछ अड़ी अड़ी 
 कुछ चिड-चिड 
 करती ज़िन्दगी .......... 

Saturday, January 12, 2013

ज़िन्दगी के कमरों 
में सब कुछ 
बेतरतीब बिखरा हुआ 
सा है 
यहाँ-वहां, जहाँ-तहां 
लम्हों पे धुल ही धुल है 
पर- बेफिक्री का 
आलम कुछ यूँ है की -
कोई  ख्वाहिश या ख़्वाब 
आज कल दस्तक दे तो 
दिल दरवाज़ों के पीछे से 
पूछता है-
क्या ठीक करूँ?
क्या फेंक दूँ ?
क्या थाम लूँ?
क्या छोड़ दूँ ?
क्या दुआ करूँ ?
क्या क़त्ल करूँ?
क्या दांव लगाऊं ?
क्या गँवा दूँ ?
क्या छीन लूँ ?
क्या दान करूँ ?
क्या प्यार करूँ?
क्या नफरत करूँ?
 क्या रुक जाऊं ?
 क्या चलती रहूँ?
क्या वक़्त लूँ ?
क्या भागने दूँ ?
क्या आने दूं ?
 क्या अलविदा कहूँ ?

ख्वाब और ख्वाहिश तो 
मेहमान हैं 
आते हैं, उल्टे पाँव 
 लौट  जाते हैं 

      एक ज़िन्दगी है जो 
     बेफिक्र और बेपरवाह 
    नींद से जाग उठती है 
    और कमरों की 
    बिखरी चीज़ों में कहीं 
   इन सवालों के जवाब 
   ढूँढने लगी है 
   यूँ ही बेवजह जाने क्यूँ ?

Saturday, January 5, 2013

मैं अब 
ख्वाब में भी संभल कर 
चलती हूँ 
वहां भी 
इधर ऊधर 
आस पास 
पहले देखती हूँ 
फिर दरवाज़े कस के बंद करती हूँ ...
खिडकियों से अब 
सूर्य की  किरणों 
का आना जाना 
बंद कर दिया है 
रात को छत की 
मुंडेर से टिककर तारों को 
टकटकी लगाये 
देखना छोड़ दिया है 
खेतों में खिल आये 
सरसों के पीले पीले 
फूलों को अपने न 
होने का ख़त लिख 
भेज दिया है .....
                --जब से 
                सुना है गाँव गाँव शहर शहर 
                में बेटियों की सुरक्षा 
                के लिए सब ने कमर कस ली है
               क्या ये पहरेदारी बढ़ने 
               का संकेत है या 
               एक नई सोच की 
               संरचना में उठा पहला कदम ?
                    फिलहाल मैं परेशान हूँ ........