Sunday, August 28, 2011

आईने में उतर
आती है जो छवि 
वो दीखता तो मुझसा 
है 
पर उसके ज़ेहन 
में पनपते सवाल यकीनन 
भिन्न हैं..
अक्सर उस मै से
बहस छिड़ती है
वो अचरज से मेरी
ओर देखकर पूछता 
है क्यूँ
मेरे माथे पे उभरी 
लकीरें परेशान दिखती हैं...
मेरे हाथ बरबस ही
माथे पे चले जाते हैं
कुछ कह न पाने की
विवशता मुझे कचोटती है
और प्रश्नसूचक दृष्टि से
मै को देखती हुए 
पूछती हूँ क्यूँ
उसके होठों पे
आई मुस्कान अधूरी सी
लगती है....


दोनों ही मौन में 
घुलते हैं 
अवाक् कुछ छड़
और एक साथ
आँखें मूँद लेते हैं.......


Wednesday, August 24, 2011

कितने ही हाथ आज 
पताका लिए उठे हुए है
सड़कों पे उमड़ आया 
है हुजूम लोगों का 
इनकी जुबाँ पे 
देश की 'दूसरी आजादी' 
का नारा गूंज
रहा है...
तेज़ी से बदलते समाज
और उसके मीडिया तंत्रों
की माने तो 
सब कुछ ठीक ठाक ही
लगता है
ये देशहित की भावना से
ओतप्रोत हैं 
अभिव्यक्त करने की 
आज़ादी का ये एक
बेहतरीन नमूना है...


पर....


प्रजातंत्र की नींव 
पर उमड़ी ये भीड़ और
आवाज़ सवालों  से परे
नहीं....
वो सवाल जो इन्होने 
पूछने ज़रूरी नहीं
समझे 
वो सवाल जिनके जवाब 
इनके मसीहा ने सोचे नहीं
.....अगर एक व्यक्ति ही पूरा देश बन गया
.. फिर क्या  उस देश को संविधान की नहीं
....सिर्फ एक सुदर्शन चक्र की ज़रुरत होगी???
    !!!!






Tuesday, August 23, 2011

ये शब्द ही हैं 
जो हमें घेरे रहते है
दिन रात 
उपजते रहते हैं
असंख्य जज़्बात 
इनकी ध्वनियों से
और इनकी खामोशियों से भी....

Monday, August 8, 2011

अनायास ही
राहों में कुछ 
बिछड़े हुए पल मिले 
और हाथ यूँ ही
आगे बढ़ गए....
वो शायद चुनना चाहते
थे कुछ सपनो को...
और थम कर 
 छू लेना चाहते थे
उस चेहरे पे टिकी
मुस्कान को...
जिसे अनगिनत 
लम्हें लगे 
होठों तक आने में....

Thursday, August 4, 2011


मैं खींचती हूँ
अनगिनत रेखाएं 
पर कोई आकर 
मिलता 
नहीं उनमें...
भरती हूँ हज़ार रंग
खाली जगहों में
पर कोई दृश्य 
फिर भी उभरता नहीं...
खोजती हूँ हर दिन 
चेहरों में कई चेहरे
पर एक कागज़ के टुकड़े 
पे सब कुछ सिमटता नहीं.....

सागर की 
ऊँची नीची 
घटती बढती 
इठलाती लहराती 
साहिलों से 
मिलती बिछड़ती 
लहरों से परे
कहीं गहराईयों 
की असीमित 
खामोशियों के
भंवर में 
उलझा मौन 
सुलझने  को बेचैन है......