बरसात की रात
मैं कटोरों में काटता हूँ
चम्मचों में भी
बूंदों को रोकता हूँ....
चिलचिलाती गर्मी
मैं फूटपाथ पे काटता हूँ
अपनी कमीज़
को पसीने से धोता हूँ....
सर्दियों की शाम
मैं सुलगती बीड़ी से काटता हूँ
काठ सी होती हथेलियों को
अपने घुटनों के बीच सेंकता हूँ....
आपने बिलकुल ठीक-ठीक पहचाना
आपकी टूटी छत की जिसने मरम्मत की
वही मजदूर हूँ मैं.......
मैं कटोरों में काटता हूँ
चम्मचों में भी
बूंदों को रोकता हूँ....
चिलचिलाती गर्मी
मैं फूटपाथ पे काटता हूँ
अपनी कमीज़
को पसीने से धोता हूँ....
सर्दियों की शाम
मैं सुलगती बीड़ी से काटता हूँ
काठ सी होती हथेलियों को
अपने घुटनों के बीच सेंकता हूँ....
आपने बिलकुल ठीक-ठीक पहचाना
आपकी टूटी छत की जिसने मरम्मत की
वही मजदूर हूँ मैं.......
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