क्यूँ थक हार जाता हूँ मैं
जब जब देखना चाहा मैंने
सागर आकाश धरती
पहाड़, सूरज, चाँद
फ़ूल और तारों
से बहुत दूर कुछ और .....
क्यूँ खोने लगता हूँ मैं
जब-जब पाना चाहा मैंने
यश, नाम, धन
सफलता, धीरज, ख़ुशी
और उम्मीद की
सीमाओं से परे कुछ और .....
क्यूँ टूटने लगता हूँ मैं
जब-जब तोड़ना चाहा मैंने
नियम, काएदे , उसूल
बंधन, जेल, और समाज
की ज़ंजीरों से भी मज़बूत कुछ और ....
क्या इतना कमज़ोर है जीवन
जो रह -रह कर बिखर जाता है?
या फिर इतना तथस्ट की
सब कुछ हार कर भी
जीत लेता है जीवन से भी
उज्जवल कुछ और ..........
जब जब देखना चाहा मैंने
सागर आकाश धरती
पहाड़, सूरज, चाँद
फ़ूल और तारों
से बहुत दूर कुछ और .....
क्यूँ खोने लगता हूँ मैं
जब-जब पाना चाहा मैंने
यश, नाम, धन
सफलता, धीरज, ख़ुशी
और उम्मीद की
सीमाओं से परे कुछ और .....
क्यूँ टूटने लगता हूँ मैं
जब-जब तोड़ना चाहा मैंने
नियम, काएदे , उसूल
बंधन, जेल, और समाज
की ज़ंजीरों से भी मज़बूत कुछ और ....
क्या इतना कमज़ोर है जीवन
जो रह -रह कर बिखर जाता है?
या फिर इतना तथस्ट की
सब कुछ हार कर भी
जीत लेता है जीवन से भी
उज्जवल कुछ और ..........
ye toh mere upar ekdum fit hai abhi :)
ReplyDeletegud one again.
kp playing with words...it's fun.