Thursday, September 29, 2011

सोचा था 
फ़ैल जायेंगे मेरे पंख 
और समा जायेगा 
ब्रह्माण्ड  उसके
विस्तार में...
नहीं सोचा था 
जब खुलेंगे पंख 
मुझे उड़ना होगा 
और पहुंचना होगा 
वहां जहाँ मिलते
हैं आकाश और ये धरती.....

Sunday, September 25, 2011

आकांछाएं 
कुछ इस तरह उडती 
हैं 
मानो धरती से कोई 
वास्ता न हो 

आकांछाएं 
कुछ यूँ गाती हैं
मानो हर सुर 
में उसकी आत्मा बस्ती हो

आकांछाएं 
कुछ यूँ बहती हैं
मानो सागर ही उसका 
प्रियतम हो

आकांछाएं 
कुछ यूँ चमकती हैं
मानो सूर्य किरणों से
नहाई हो....

आकांछाएं 
कुछ यूँ फैलती हैं
मानो जीवन अमर हो ........

Saturday, September 10, 2011

सम्पूर्ण जीवन एक गतिमय छाया
   गोधुली अनुभूति में नहाया
   निरंतर स्तब्ध! विचरता जीवन 
   विपरीत विचारों में किसी
   संधी की गुंजाईश से परे 
   जूझता, खंगालता-
   उस ''मै'' को जो
   उपस्थित है
   बेसबब ढूंढता-
   उसे ''मै'' को भी
   जो चिंतन में विलीन है
   वो अनुपस्थित साया....


सम्पूर्ण  जीवन एक गतिमय छाया
सम्पूर्ण जीवन दृश्य और अदृश्य माया......

Monday, September 5, 2011

जब---
इक ग़ुबार सा 
उठता है
और सपनो की
बस्ती में हलचल होती है
उनके  हँसते 
चेहरों पर उदासी 
घिर जाती है..
सुकून में सोये कुछ 
ख्वाबों को
आते हुए  बवंडर की
भनक लगती है..
तब....
वो जीवन के
प्रहरी बन जागते हैं
कठिन घड़ियों में
ही सपने
सबसे ज्यादा तथस्ट बनते हैं.....




Saturday, September 3, 2011

किस ख़ुदा की
बन्दिगी में 
सर झुकाऊं 
किस ईश्वर
के चरणों में 
आरती के फूल
चढाऊं 
चारों ओर घिरे 
अन्धकार 
में कोई रौशनी 
दिखती नहीं
किस ईसा में
आस्था करूँ
ऐसा समय है 
ये भी
की धर्मनिष्ठ बन्दों
को भी देखा
जिनके दीपों 
से ज्योति नहीं
ज्वाला धधकी 
और ध्वस्त होती
रही इंसा-नीयत....

ऐसे विषम समय में 
किस देवालय में जाकर 
इक इंसान से मिलूं ??