Tuesday, April 30, 2013



मेरे हाथों 
से न जाने कितनी 
इमारतें ढली हैं 
जिनकी खिडकियों 
से आप चाँद को चुरा  
लेने का दुस्साहस 
बड़ी जिंदादिली से 
कर रहे हैं .....
मेरे हाथों 
ने न जाने कितनी  
पथरीली  राहों 
को तराशा है 
जिनपे दौड़ती 
गाड़ियों में बैठे आप 
हवा से बातें करने 
का दावा कर रहे  हैं .....
मेरे हाथों 
ने न जाने कितने 
धागों को लिबास 
में पिरोया है 
जिन्हें पहन 
आप  रेशमी 
एहसास का लुफ्त 
उठा रहे हैं  ..... 
मेरे हाथों 
ने न जाने 
कितने कोयले की 
खानों में हीरों 
और सोने की 
खनक  को ढूँढा है 
जिनके बाज़ार पे 
आप की चमकीली 
दुनिया खन -खन  
कर रही है .....
मेरे हाथो 
ने न जाने 
कितने खेतों में 
धान रोपा है 
जिसकी उपज 
पे सत्ता के सुल्तान 
अपना हक बेख़ौफ़ 
जता रहे हैं  ........
-निरंतर 
मेरे हाथों 
ने न जाने 
कितने पहाड़ों 
जंगलों, समुन्दरों 
को छू कर 
जीवंत किया है 
जिनकी बाहों में 
झूलते हुए आप
बड़ी चालाकी 
से हमें बेदखल 
कर रहे हैं ......
         मैं फिर भी 
         हाथों में आते 
         पसीने को 
         अपनी फटीं कमीज़ 
         में पोछते हुए 
         अपनी और अपने 
         जैसे लाखों करोड़ों 
         के लिए एक 
         दिन एक नयी दुनिया 
         का निर्माण कर ही लूँगा ......... 
         
          

Monday, April 29, 2013

सड़कों पे, गलियों में 
प्लेटफार्म पे, मंदिरों में 
ठसाठस भरी रेलों में 
बसों में 
आते जाते
अनगिनत चेहरे ही चेहरे! 
छोटे छोटे शरारती 
बच्चों के, 
घर की खटर-पटर से 
फ़ुर्सत लेती औरतों के, 
बॉस की तानाशाही से 
परेशां मुलाज़िमो के,
बेरोज़गारी की मार खाते 
लाखों नौजवानों के,
बुढ़ापे का दर्द झेलते 
नाना नानियों के,
कन्धों पे कुदार का 
भार उठाये मेहनतकशों के,
 कुछ खोये से
 कुछ परेशान  से
 कुछ हँसते हुए
 कुछ मायूस से
 हर दिन हर घडी
 यहाँ से वहां
 कहीं से निकले 
 कहीं को जाते हुए
 चेहरे ही चेहरे!
इन सब अजनबी 
चेहरों को देखकर यही लगता 
है कि -
हर चेहरे की आँखों का पानी
खारा-खारा सा होगा 
हर चेहरे में कोई 
और भी चेहरा कैद होगा 
हर चेहरे की कहानी 
को रचने वाला कोई 
माहिर कलाकार होगा ....

Sunday, April 28, 2013

आज कल ऐसे ख्वाब आते है दबे पाँव,
जिनके आने से आँखों में डर की स्याही
और भी गहरी होती जा रही है
ख्वाब लिख रहें हैं ऐसी कहानियां
जिनके किरदार भी  सहमे सहमे से
फिर रहे हैं चुपचाप सुनसान
गलियों से ढूंढते हुए
अपना घर अपनी पहचान
इनके बेबस दिलों में बैठे  हैं
वो सारे सवाल
जिनके जवाब ख्वाब
ने छुपा कर रखे हैं 
अपनी कहानियों के
शीश महल में
जहाँ पहुँच कर भी 
मुश्किल है रूबरू होना  
जवाबों  से सालों साल 
कि हर जवाब यहाँ आईना है 
जिसके आर पार 
पसरा हुआ है संसार का मायाजाल .......




Friday, April 19, 2013

कुछ ऐसे  भी  
खयाल आते हैं अक्सर 
कि काश ज़िन्दगी की 
अदला-बदली हो सकती 
एक ऐसा भी मेला 
लगता जहाँ
मिलती खूबसूरत  
हंसती मुस्कुराती ज़िंदगियाँ 
हम बदल सकते 
अपना आवरण 
पहन लेते झट से 
एक दूसरा जीवन 
और मेले में 
 छोड़ आते अपनी 
 कुछ रूठी- रूठी 
 कुछ खट्टी खट्टी 
 कुछ टेढ़ी- मेढ़ी 
 कुछ अड़ी अड़ी 
 कुछ चिड-चिड 
 करती ज़िन्दगी ..........