मेरे हाथों
से न जाने कितनी
इमारतें ढली हैं
जिनकी खिडकियों
से आप चाँद को चुरा
लेने का दुस्साहस
बड़ी जिंदादिली से
कर रहे हैं .....
मेरे हाथों
ने न जाने कितनी
पथरीली राहों
को तराशा है
जिनपे दौड़ती
गाड़ियों में बैठे आप
हवा से बातें करने
का दावा कर रहे हैं .....
मेरे हाथों
ने न जाने कितने
धागों को लिबास
में पिरोया है
जिन्हें पहन
आप रेशमी
एहसास का लुफ्त
उठा रहे हैं .....
मेरे हाथों
ने न जाने
कितने कोयले की
खानों में हीरों
और सोने की
खनक को ढूँढा है
जिनके बाज़ार पे
आप की चमकीली
दुनिया खन -खन
कर रही है .....
मेरे हाथो
ने न जाने
कितने खेतों में
धान रोपा है
जिसकी उपज
पे सत्ता के सुल्तान
अपना हक बेख़ौफ़
जता रहे हैं ........
-निरंतर
मेरे हाथों
ने न जाने
कितने पहाड़ों
जंगलों, समुन्दरों
को छू कर
जीवंत किया है
जिनकी बाहों में
झूलते हुए आप
बड़ी चालाकी
से हमें बेदखल
कर रहे हैं ......
मैं फिर भी
हाथों में आते
पसीने को
अपनी फटीं कमीज़
में पोछते हुए
अपनी और अपने
जैसे लाखों करोड़ों
के लिए एक
दिन एक नयी दुनिया
का निर्माण कर ही लूँगा .........