Friday, August 17, 2012

वो कहना चाहता 
था किसी से--
जुबां पे जो बात 
आकर रुकी थी
वो दिखाना चाहता 
था किसी को --
जज़्बात जो ह्रदय 
के सिरहाने सो गए थे 
वो थिरकना चाहता 
था किसी के साथ--
उन धुनों पे 
जो शब्दों में उलझ 
गए थे 
वो मनाना  चाहता 
था किसी को --
देकर कुछ ख्वाब 
जो मिट कर 
तारे बन गए थे
वो पिरोना चाहता 
था किसी के लिए--
हार जिनके मोती 
सागर की गहराईयों 
में जा छुपे थे 
वो चलना  चाहता था 
किसी को लिए ---
उन बादलों पे 
जो घटायें बन 
बरस चुके थे.....
         
        
         


Monday, August 13, 2012

बहुत दिन गुज़र गए 
आईना देखे हुए 
आज जब रूबरू हुए 
खुद से 
तो आईना न देखने 
का अफ़सोस नहीं था 
नज़रों को क्यूंकि---
मैं की छवि में 
छींटे थे लहू के 
उन मासूम जज्बातों के 
जिनका क़त्ल किया था 
मैंने दिन दहाड़े 
बस एक उन्माद और 
झूठी नफरत में 
सने खंजर से ......
      अपनी हस्ती को देख 
      मैं हैरान हूँ 
     चौराहे पे हर किसी से 
     कहता फिरता हूँ   
     की मुझे गौर से मत देखो 
     कि मैं एक आईना हूँ 
     जिसमे हर शक्ल एक 
     हैवान  ही नज़र आती है....