एक आखिरी ख़त
का पहला वाक्य
शब्दों के मायाजाल
में कुछ यूँ उलझा
की हर शब्द के
अर्थ बदलते रहे
एक दूसरे से जुड़ने
के बाद --
शब्द जिन्हें ओढना
था सुनहली धूप की चादर
वो टांकते रहे पैबंद
रात के अँधेरे काँटों से तार-तार
हुए अस्तित्व पर...
शब्द जिन्हें ढलना
था सोयी हुई दूब पर
ओस की ठंडी बूँदें बनकर
वो सिमटते गए
आँखों की टोकरियों में
रात घुमड़ आये
बादलों की गर्जनों
से डरकर.....