Monday, November 10, 2014

तू अपनी नज़र हम पर रखना
किस हाल में हैं हम ये खबर रखना... 

Monday, November 3, 2014

प्रेम।
अन्धकार है
सितारों के इर्द गिर्द फैला सा...

प्रेम ?
मरुस्थल है
मृगजल  में झिलमिलाता सा ....

प्रेम ?
काजल है
नैनो के सागर पे ठहरे किनारों सा ...

प्रेम ?
आँगन है
घर के किवाड़ों को खोलता सा ...

प्रेम ?
विस्तार है
मन की गिरह में संकुचित सा ....


Tuesday, October 14, 2014

मन पता नहीं कहाँ कहाँ जाता है
कैसी कैसी बातों के बीच
बैठ जाता है
चुपचाप सुनता रहता है
एक मूक आगंतुक की तरह
देर तक। …
जब थकने के कारण
उसकी पलकें झपकने लगती हैं
तो वहीँ निढाल हो जाता है
बातों के बीच की
तंग जगहों में ...
फिर बिन करवटों की
जटिल नींद से झुंझलाकर
उठ बैठता है
तब तक बातें फुसफुसाहट
में तब्दील हो चुकी
होती हैं
मन अपनी उपस्थिति या
अनुपस्थिति से  बेपरवाह
वहां से  निकल जाता है
कहीं और के लिए 

Wednesday, October 8, 2014

पेसोआ की आत्मकथा - 

छंठा अध्याय

ज़िन्दगी से बहुत कम की गुज़ारिश की है और जिंदगी ने मुझे उतने से भी मरहूम रखा है।  क्या चाहा ?-एक छोटी सी जमीं, धुप की एक किरण , थोड़ा सा सुकून और जितने से भूख मिटे बस उतनी रोटी और अपने होने के एहसास तले मैं न दबूं , लोगो से कोई उम्मीद न हो और न ही लोग मुझसे कुछ चाहें या अपेक्षा करें -मुझे ये भी नसीब नहीं, जैसे किसी भिखारी को एक आना भी नहीं मिलता इसलिए नहीं कि लोग स्वार्थी और बेरहम होते हैं पर  इसलिए क्यूंकि उनके अंदर कोट के बटन खोलने की कोई प्रबल इच्छा नहीं जागती। 
अपने ख़ामोशी रवां कमरे में मैं बैठा लिख रहा हूँ, अकेला हूँ यहाँ और हमेशा ही अकेला रहूंगा। मैं सोचकर हैरान होता हूँ की मेरी  नगण्य आवाज़ उन हज़ारों आवाज़ों के मर्म को समाविष्ट करने में सक्षम न हो, हज़ारों ज़िन्दगियों की स्व अभिव्यक्ति की अभिलाषा, लाखों आत्माएं जो मेरी तरह ही रोज़मर्रा के कामों में खोयी  हुई हैं , उनके निरर्थक ख्वाब और उनके निराशात्मक उम्मीदें। इन घड़ियों में मेरी धड़कने बढ़ सी जाती हैं क्यूंकि मैं इन सब उलझनों से अभिज्ञ होने लगता हूँ। मैं ज्यादा जीवित महसूस करने लगता हूँ ,जैसे किसी खुमार में। मेरे भीतर मैं कोई आध्यात्मिक ओज महसूस करता हूँ।  एक दुआ निकलती है किसी हुजूम की चीख की तरह।  पर मेरा ज़ेहन ,तुरंत, मुझे मेरी जगह पे ला पटकता है और मैं खुद को ऊंघती निगाहों से देखता हूँ। मैं इन आधे अधूरे लिखे पन्ने से अपनी नज़र उठा करअपने जीवन को देखता हूँ, व्यर्थ  और किसी भी खूबसूरती से वंचित जीवन, फिर अपनी सस्ती सिगरेट को देखता हूँ जिसे मैं बस ऐशट्रे में  बुझाने ही वाला हूँ इन कागज़ों पे सोखते लफ़्ज़ों में जब्त किसी युद्ध की विवेचना से परे। 
इस चौथे मंजिल पे स्थित मेरे कमरे में मैं जीवन को खंगाल रहा हूँ।  कह रहा  हूँ आत्मव्यथा , किसी मशहूर लेखक या बुद्धजीवी की भाँति कहानी बुन रहा हूँ।  मैं, यहाँ अपूर्व हूँ ......

Friday, October 3, 2014

देखते! देखते !

पूरे एक साल गुज़र गए इस शहर में। मुझे नहीं मालूम कि इस शहर ने मुझे कितना अपनाया है और मुझे इस बात का भी इल्म नहीं कि मैंने इसे कितना आत्मसात किया है इन वक़्तों में। इसके रास्ते अब पहचानने लगी हूँ,
इसके चेहरों से थोड़ा वाकिफ हूँ थोड़ी अनजान हूँ। इसकी हवा में शामिल खुशबुएँ कभी मन हल्का करती हैं कभी शामें बोझिल करती हैं। पहले कभी इतना गौर नहीं किया करती थी और अब करने लगी हूँ। मुझे नहीं मालूम की ये कहाँ तक सही है की जगह के अनुसार लोगों का सामान्यीकरण किया जाये, पर ऐसा करना शायद जल्दबाजी है।  हर जगह अच्छी और बुरी बातें हुआ करती  हैं। हमारे एहसास हमारी परिस्थितियों के मुताबिक बनते बिगड़ते रहते हैं और कई उम्र लग जाती है कोई एक ठोस नजरिया बनाने में। यहाँ कुछ अंजानी परिस्थतियों से मेरा राबता हुआ और उनके कारण मुझे कुछ एक ऐसे लोग मिले जो मुझे बेहद संजीदा और मर्मस्पर्शी मालूम हुए। फिर दूसरी हीं तरफ ऐसे लोगों को भी करीब से देखने का मौका मिला जो जीवन की बहुत सामान्य और मामूली खूबियों से भी मरहूम लगे मुझे , उनमे कड़वाहटों और स्वार्थ की गंध इस कदर मिली की इंसानियत जैसे ख़ूबसूरत लफ़्ज़ पे भरोसा थोड़ा टूटने सा लगा पर टूटा नहीं है और उम्मीद बाकी है :) इस शहर में अपने रास्ते मैंने खुद ढूंढें कभीइ  दोस्तों कभी अजनबियों की मदद लेते हुए, कभी भटकते हुए सही रास्ते मिले हैं और कभी सही रास्तों के भुलावे में अँधेरी गलियों से भी गुजरी।  
कुछ सपनों से छुपकर यहाँ आई थी वो ख्वाब अभी भी पीछे हैं, मेरी तम्मना है उसे उसकी मुस्तकबिल तक ले कर जाऊँ और फिर अलविदा कहूँ इसके पहले कि ये नया शहर पुराना होने लगे मेरे लिए..... 

Monday, September 29, 2014

शेष से आगे..



पर कुछ और भी है- इन लम्बे बोझिल खाली घंटों में एक उदासी, जिसे मेरा अस्तित्व महसूस करता है, जो मेरे ज़ेहन से उठ कर मेरे दिमाग में फैल जाता है।  एक कड़वी जागरूकता का आभास होता है की ये  मेरा अनुभव है पर फिर भी मेरे बाहर है, ऐसा कुछ जिसे मैं चाह कर भी नहीं बदल सकता। कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि मेरे ख्वाब मेरे सामने यूँ चले आये हैं मानो वो ख्वाब न होकर वास्तविक चीज़ें हों। वो ऐसा इसलिए नहीं करते कि वो किसी सच की जगह लेना चाहते हैं। वो उस स्तर तक उठते हैं क्यूंकि वो जताना चाहते हैं कि वो किसी भी तथ्य के बराबर हैं उससे कमतर नहीं। वो उतने ही साक्ष्य हैं जितने की कोई और जीती जागती चीज़ें हैं जीवन में।  मैं जितना ही उन्हें पीछे धकेलता हूँ वो उतनी ही उद्दण्तता से खुद के होने का एहसास कराते हैं और मुझसे छिटक कर कुछ यूँ अलग हो जाते हैं जैसे- सड़क के आखिरी कोने से ट्राम मुड़ जाती है, कई आवाज़ों को भेदती हुई रात के प्रहरी के चीखने की आवाज़ आती है, वो क्या कहता है समझ में नहीं आता पर उसकी आवाज़ अलग से सुनाई देती है, कोई अरबी आयत जो झरने सी गिरती है गंतव्य में पसरी नीरस गोधूलिका में। 
संभावित जोड़े, बक बक करती लड़कियाँ , जल्दबाजी में भागते युवक सब गुज़र रहे हैं इन रास्तो से, कुछ हैं जो ज़िन्दगी की मसरूफ़ियतो से खाली हो चुके हैं और रोज की तरह टहलने निकले हैं, कुछ एक दुकानों के  दरवाजों पे उनके मालिक इंतज़ार में खड़े हैं हर एक चीज़ से बेखबर होकर, कुछ लम्बे चौड़े कुछ दुबले पतले सैनिकों की बटालियन भी निकल रही है  यहाँ से, शोर से ज्यादा हलचल मचाते हुए, कभी कोई बहुत मामूली इंसान भी जाता हुआ नज़र आ जाता है।  समय के इस पहर में कारें काम ही दिखती हैं इस सड़क पे  और कभी-कभी एक दो कारें मधुर संगीत सुनाती हुई निकल जाती हैं।  मेरे ह्रदय में एक पीड़ा व्याप्त है जो मुझे कत्तई विचलित नही कर रही, ये धीरता मेरे सब कुछ  छोड़ देने के कारण मुझे मिली है। 
ये सब कुछ चला जा रहा है और इन सबका मेरे लिए कोई मायने नहीं है।  मेरी तकदीर से इनका कोई वास्ता नही है और न ही पूर्ण नियति के साथ।  ये सिर्फ बेखबरी है, ये उस विरोध में निकले श्राप हैं जब परिस्थितियाँ पत्थर मारती हैं, ये अंजानी आवाजों की गूंजे हैं---अस्तव्यस्त जीवन की सामूहिकता और कुछ नही। 

Tuesday, September 23, 2014

२ --
जिससे मैं घृणा करता हूँ  मुझे उसे इख़्तियार करना है ---ख्वाब देखना, जिसे मेरा  विवेक घृणा करता है ; या फिर काम करना, जिसे मेरी संवेदना घृणा करती है।  काम, जिसके लिए मैं समझता हूँ मैं नहीं जन्मा हूँ या फिर ख्वाब देखना, जिसके लिए कोई भी नहीं जन्मा।  दोनों से  मैं घृणा करता हूँ इसलिए इनमे  से किसी को नही चुनता हूँ, पर कई बार मुझे ख्वाब बुनने पड़ते हैं  और कई बार  काम के बोझ को ढोना पड़ता है। मैं दोनों को  अक्सर मिला लेता हूँ अपनी सुविधानुसार। 

३ --

शहर में गर्मियों की ढलती शामों में पसरा ठहराव में मुझे बेहद अजीज़ है , ये स्थिरता शहर के कोलाहल और हलचल की तुलना में ज्यादा तथस्ट है।  Rua do Arsenal, Rua do Alfandega, और पूर्व की  ओर बढ़ती जाती वो उदास राह  जहाँ  Rua do Alfandega के रास्ते मुड़ते हैं, खामोश खड़े बंदरगाह के पास से गुज़रती राह , इन सब में ठहरा दुःख मुझे सुकून देता है जब जब मैं यहाँ से गुज़रते हुए इनके एकाकीपन से मिलता हूँ।  जिस दौर में मैं जी रहा हूँ उसके ठीक पुर्व के  दौर में मैं फिसल जाता हूँ और इस बात से खुश होने लगता हूँ की मैं Cisario Verde  के समय में  पहुँच गया हूँ , हालांकि मेरे पास उनके जैसी कविता नहीं है पर उनकी कविताओं में मौजूद भाव को मैं अपने भीतर  महसूस करने लगता हूँ।  इन सड़को पे चलते हुए जब तक रात गहरा न जाये मुझे ये एहसास होता है कि मेरी ज़िन्दगी उनके  जैसी है। पूरे दिन वो अर्थहीन गतिविधियों में मसरूफ होती है और रात के आने के साथ अर्थहीन शून्यता से भर जाता है।  दिन में मैं कुछ भी नही होता  और गहन रात में मेरा खुद मुझसे मिलता है।  मुझे इन तमाम राहों में और मुझमे कोई  फर्क नज़र नहीं आता, बस ये  कि ये राह है और मेरा मैं एक रूह जिसका कोई महत्व नही क्यूंकि इसमें कोई तत्व नहीं। वस्तु और व्यक्ति को एक ही तरह की अमूर्त किस्मत मिली है, दोनों दुनिया के किसी  रहस्यमयी  बीजगणित  के सवाल को हल करते हुए एक जैसी उदासीन मंज़िल की ओर अग्रसर हैं.... 

… शेष  

Saturday, September 20, 2014

१ -शुरू से....

मैं समय के उस दौर में दुनिया में आया जब ज़्यादातर नौजवानो का ईश्वर पर से विश्वास खो रहा था  ठीक उसी  कारण जिसकी वजह से बुजूर्गों का उसपे विश्वास बरकार था, बिना ये जाने कि 'क्यों '? क्यूंकि इंसान कुदरती तौर पे अपनी धारणाएँ अपने जज़्बात की नींव पे बनाता  है  न कि चेतना या तर्क की ज़मीं पे परख कर इसलिए इन नौजवानों ने इंसानियत को ईश्वर की जगह पे तवज्जो देना शुरू कर दिया है। हालाँकि, मैं एक ऐसा बंदा हूँ जो हमेशा से उन चीज़ों के किनारे खड़ा रहा हूँ जिनसे मैं  जुड़ा हुआ हूँ, मैं सिर्फ  उन सारी चीज़ों को गौर से नहीं देखता हूँ जिनके बीच मैं फंसा हूँ बल्कि उनके आस पास फैले विस्तार को भी देखता हूँ। शायद  यही वजह है कि मैंने ईश्वर को पूरी तरह नहीं छोड़ा है जैसे औरों ने कर रखा है।  मैंने ये विचार किया है कि ईश्वर असंभावित है पर उसका होना भी उतना ही लाज़िमी है इसलिए उसकी इबादत की जा सकती है, वहीँ, इंसानियत सिर्फ एक जैविक अवधारणा है और ये उससे कत्तई भिन्न नहीं है जिन जीव प्रजातियों में हम सब शामिल है, इस लिहाज़ से इंसानियत किसी इबादत के लायक नही है ठीक वैसे ही जैसे अन्य जीव प्रजातियाँ नहीं होते। आज़ादी और समानता के संस्कारों में  रचा बसा इंसानियत का पंथ मुझे हैरान करता है और मुझे ऐसा लगता है कि ये उन प्राचीन पंथों का पुनरुद्धार है जिसमे देवता जीवों जैसे होते थे या फिर जिनके चेहरे जीवों की तरह  होते थे। 
बहरहाल, मुझे नहीं मालूम की ईश्वर या  जीव  में भरोसा कैसे करते हैं इसलिए मैं उन और लोगों की तरह जो हाशिए पे रहते हैं, इन दोनो चीज़ों से एक दूरी बनाये रखी है एक ऐसी दूरी जिसे आम भाषा में पतन कहा जाता है।  अचेतना का पूरी तरह नाश होना ही पतन है जो कि जीवन का मूल स्त्रोत है। जो अगर वो सोचने लगे तो ह्रदय धड़कना बंद कर देगा। 
वो कुछ लोग जो मेरी तरह जीते हैं बिना ये जाने की ज़िन्दगी को कैसे अपनाते हैं उनके लिए क्या बचता है सिवाय आत्मत्याग का रास्ता अपनाने के और अपनी तक़दीर का अवलोकन या  विवेचना करने के ?
एक नया अध्याय -१ 


ये एक कोशिश है Fernando Pessoa की आत्मकथा The Book of Disquiet का अनुवाद  करने की, कुछ अपने तरीके से ...





बेचैनियों की किस्सागोई 


मैं  हतप्रभ रह जाता हूँ  जब भी कुछ खत्म करता हूँ।  हैरानगी और तकलीफ दो जज़्बात एकसाथ मुझे घेर लेते हैं।  मेरी पूर्णतावादी वृत्ति को मुझे कुछ भी ख़त्म करने से रोकना चाहिए, उसे तो मुझे कुछ शुरू करने से भी रोकना चाहिए। मैं हूँ जो हमेशा  विचलित होकर कुछ न कुछ शुरू कर देता हूँ और खुद को उलझाए रखता हूँ। ऐसा करने से जो कुछ हासिल होता है वो मेरी इच्छा से प्रेरित हुए  मेरे   काम की वजह से  नहीं बल्कि मेरी इच्छा के समर्पण के कारण होता है।  मैं शुरुआत करता हूँ क्यूंकि मेरे  भीतर और सोचने की शक्ति नहीं होती, मैं खुद को कमज़ोर पाता हूँ, कुछ  भी सोचने समझने के लिए और मैं खत्म करता हूँ क्यूंकि मेरे अंदर कुछ अधूरा छोड़ कर भागने का साहस नहीं होता। ये किताब मेरी ऐसी ही किसी कमज़ोरी या कायरता की उपलब्धि है।



एक तथ्यरहित आत्मकथा -


बेतरतीब, अनियमित खयालों में, जिन्हे अव्यवस्थित रखने के अलावा मेरी कोई और इच्छा नहीं, मैं निरपेक्षता के साथ अपनी आत्मकथा बयां कर रहा हूँ, मेरी नज़र में मेरा निर्जीव इतिहास।  ये मेरी संस्वीकृति है और अगर इसमें 'मैं' कुछ नहीं कह  रहा हूँ तो वो इसलिए क्यूंकि मेरे पास असल में कहने को कुछ भी नहीं।