Friday, July 29, 2011

भोर होती नहीं
और आँगन में 
झाड़ू बुहारने की
आवाज़ 
कानो में शिरकत करने 
लगती है,
फिर शुरू होती 
है बर्तनों से जंग
अंगीठी से निकलता
धुआं खिडकियों के 
रास्ते घुस कर 
बता जाता है
की रोटी सिकने 
की तयारी हो चुकी है
कौवे भी अपनी
अपनी कांव-कांव से
सुबह को और थोडा 
जीवंत बनाकर 
उड़ जाते हैं....
चुन्नी के रोते 
ही पता चलता है
उसकी चोटी कस
कर बाँधी जा रही है...
हुक्के की गड़ गड़  
ये संदेसा लाती  है
है की 
दद्दू सुबह की सैर 
से लौट आयें हैं
दादी के मुख 
से निकलते राम-राम 
की धूनी
ये बता जाती 
है की उसे चाय 
आज भी देर से मिली है...
मैं भी धीरे से उठ
कर स्नानघर में 
घुस जाता हूँ ... 
             और जिसके उठते ही 
             दिन के शुरू होने 
             की खबर देने लगती 
             हैं  ये सारी ध्वनियाँ 
             मैं हर रोज़ उसे 
             चुपचाप भूल जाता हूँ.....
             




Tuesday, July 26, 2011

कारवां तो गुज़र
गया 
बस उसकी धाप से
उड़े धूल
अब तक फिज़ाओं
पे पर्दा डाले हुए है ...
तूफ़ान तो ठहर 
गया
बस उसके गर्जन 
से बनी दरारें 
अब तक आशियाँ 
की नींव को हिलाए हुए है ...
नाटक तो ख़त्म हुआ
बस मुखूटों पे तराशी 
गयी भावनाओं ने
अब तक असली चेहरों को 
पनाह दिया हुआ है.....!!!

Friday, July 22, 2011

यादें बिन बादल
बरस जाया करती हैं
रंगों  में जब
उनकी बूँदें
गिरती हैं
वो और गहरे
से हो जाते हैं...
गीली मिट्टी
से उठती सोंधी
खुशबु
हवाओं से दो चंद
बातें कर लेती है..
खिडकियों पे थपकियाँ
सी देती बूंदे
उनीदीं आँखों
को सुला जाती हैं....

वो कहता रहा
'मत बांधो मुझे'
और खुद
गुफ़ाओं में
सिमटता रहा...
वो कहता रहा
'मत छेड़ो मेरे
घावों को'
और खुद
कुरेदता रहा
ज़ख्मों को रात दिन...
वो कहता रहा
'मत तरस खाओ मुझपे'
और खुद
तरसती आँखों
के सागर में डूबता रहा.....

Thursday, July 21, 2011

कुछ खवाहिश
का कसूर था
कुछ समय का तकाज़ा
जो आज उसके
आँचल पे कई पैबंद हैं
और घिसे हुए
चप्पलों में
हज़ार मीलों के सफ़र
कैद हैं....
खोया क्या था
अब याद आता नहीं
ढूंढते फ़िरते हैं
जाने क्या फिर भी
इधर उधर....
आँखें छलक
जाती हैं
यूँ ही रह रह कर...
कारी अंधियारी
रातों में
जुगनुओं से
मिलते रहे छुप-छुप कर
उन्हें देते रहे
सपनों के मोती
हथेलियाँ भर-भर कर...

Wednesday, July 13, 2011

ज़िन्दगी के जंगलों
में छोड़े हुए
निशान ढूँढ़ते
हैं और  किसी भूली
हुई कविता
के शब्द रह-रह
कर कौंधते हैं
स्मृतियों में ज़ब्त
हैं असंख्य कहानियां
बस उनके अंत
का सिरा खोलते हैं......

Wednesday, July 6, 2011

बंद मुट्ठी में ---
      बादल का एक
      टुकड़ा
      एक टूटे हुए तारे
      की चिगारी
      थोड़ी सी धुप
      ओस की एक
      बूँद
     थोड़ी चोरी
     की गयी चांदनी
     और एक सोया
     सा ख्वाब
एतिहियात से कैद
किया है......
मेरे समय
के आँगन में
कई हिस्से हैं
और हर हिस्से में कई किस्से
छिपे हैं
कहीं सर्दी में गिरती
धूप की किरने कैद हैं
तो कहीं बारिश की कुछ
बूंदे छम छम करती हैं,

कहीं किसी कोने में u
क ख ग... a b c d
के वो सबसे पहले
सीखे हुए   स्वर गूंजते हैं
तो उधर कहीं किसी पुराने से बक्से में
बचपन में सुनी कहानियो
पे रचे नाटक आज
तक खेलते हैं
कहीं किसी हिस्से में दोस्तों
से हुई अनबन की गांठे हैं
वहीँ कहीं साथ में
कुछ दोस्तों की मस्ती भरी यादें भी हैं
पुरानी तस्वीरों से झांकते चेहरे
पूरी मासूमियत से आज की
तरफ देखते हैं
मैं गिरती पड़ती दौड़ती भागती सी
उन सारी गलियों में घूम कर आती हूँ
जहाँ जहाँ से छोटी आँखों में उतरे
कई टेढ़े मेढ़े छोटे बड़े सपने
घर से निकल कर गुज़रे थे.
बस अभी अभी आ कर रुकी हूँ
थमी हूँ, आज के सिरहाने पर
एक झपकी ले लूँ
फिर चलूंगी  अपने समय की सैर पर.......