ओर छोर....
जाने किस ओर
बढ़ते जाते हैं
कदम...
न दिमाग को
है खबर
और न
जाने मेरा मन..
सपने और हकीकत
कुछ यूँ
उलझे हुए हैं
परत दर परत
जैसे आइने में
अपनी सूरत
में नज़र आये
कोई और सूरत....
आँखों पे
ढल-ढल आती
है
चिर अंधकारमय
सी रात...
जैसे शब्दों
में न बंध
पाती हो
कोई 'चुप' सी बात.....





