Wednesday, February 23, 2011

ओर छोर....

जाने किस ओर
बढ़ते जाते हैं
कदम...
न दिमाग को
है खबर
और न
जाने मेरा मन..

सपने और हकीकत
कुछ यूँ
उलझे हुए हैं
परत दर परत
जैसे आइने में
अपनी सूरत
में नज़र आये
कोई और सूरत....


आँखों पे
ढल-ढल आती 
है
चिर अंधकारमय
सी रात...
जैसे शब्दों
में न बंध
पाती हो
कोई 'चुप' सी बात.....



Wednesday, February 16, 2011

बचपन में
पढ़ी  कहानियों
की किसी किताब
में मैंने
संभालकर रखा था
एक फूल
की पंखुड़ियों  को
इस सपने के
साथ की
वो वैसे ही
रहेंगे सदा
अपरिपक्व मन 
को ये समझ 
कहाँ थी  की
मेरे साथ साथ
उम्रदराज़ हो जायेंगे
वो भी......
आँख मिचोली...

सुरमई शाम
की आड़ में
जैसे सूरज
चुपके से
ढल  जाता है
सागर की गोद में
ऐसे ही
ठीक उसी पल
कोई ख्वाइश
छुप जाती है
पलकों की ओट में...


Tuesday, February 15, 2011

quest...

मैं खुश हूँ
न जाने क्यों
फ़िर भी आँखों में
पानी जम सा रहा है

मैं खुश हूँ
न जाने क्यों
फ़िर भी मन और दिमाग की नसे
एक दूसरे में
गुथ रही हैं

मैं खुश हूँ
न जाने क्यों
फ़िर भी मेरे घर की
खिड़कियों में
दरारें पड़ रहीं हैं

मैं खुश हूँ
न जाने क्यों
फ़िर भी मेरे दोस्त
मुझसे नाराज़ हो
कट कट से रहें हैं

मैं खुश हूँ
न जाने क्यों
फ़िर भी शाम की चाय
से अदरक का स्वाद
खो रहा है

मैं खुश हूँ
फ़िर भी
क्यूंकि मैं अनभिज्ञ
नही हूँ किसी भी दर्द से

मैं खुश हूँ
क्यूंकि, मैं दुःख की
सटीक परिभाषा की
तलाश में हूँ .........
"एक कविता का सिरा
तुम्हारे दुःख की लय में बींधता
रहता है हर पल...
शब्द हैं जो फूल बन
गूँथ जाते हैं  पूजा की माला
में हर दिन...
और इस तरह एक अधूरी कविता
अनकहे शब्दों से
मिलती रहती है सिर्फ़ मन ही मन ......"

Monday, February 14, 2011



द्वंद

मैं
सोचती
हूँ
और घिरती जाती
हूँ एक ही
सवाल के चक्रव्यूह
में
किसकी आवाज़ में
लिखूं?
खुद की
या अपने से बाहर
जो हैं उनकी?
उत्तर कई हैं
पर सही
कोई भी नहीं..
खुद से शुरू
होती हर
बात किसी
शून्य में
विलुप्त हो
जाती है ...
और
अपने आप
से बाहर निकलते ही
दुनिया
एक कुएं
सी बन जाती है..

on the status of news...

हर रोज़
कितना कुछ  
घटता रहता है...
घोटाले
बलात्कार
scandels
हत्याएं 
और ऐसा ही
कितना कुछ....
ख़बरों के बाज़ार में
मीडिया और
अखबार
पल  पल
हर घटना को
मनोहर कहानियों
में तब्दील
कर
परोस रहें हैं  
बेपरवाह लगातार
उन सब  बेचैन   
आँखों के
लिए
जिन्हें  अब नशीली
दुनिया
की आदत
लग चुकी है....
जो काले चश्मे
पहन कर जो
कुछ
घट रहा है
उसका लुफ्त उठा रहे
हैं
और इंसान की
कीमत उसकी खबर
से लगा रहे हैं.....




















Saturday, February 12, 2011

for all those women who are trying to make a difference, who are making all efforts to build a new kind of society, who are nurturing a whole new generation...







सदियों से
बंद दरवाज़ों
के पीछे
दीवारों पे ठुकी
कीलों पे टंगी
खुबसूरत तस्वीरों
में रचे
हर  चेहरे
में वो खौफ
कैद था
किसी ढलते सूरज
के नीचे बने
सागर में
अनगिनत आंसुओं
के मोती
सीपियों में
बंद थे...

डर में
लिपटे
लिबास को चेहरे से
सरकाया
घर की खिडकियों
को खोला
और हर
तस्वीर आजादी
चाहने लगी
औरत सतह
से उठ
कर उड़ने
को तैयार
होने लगी....

Friday, February 11, 2011

in salute to the peoples' revolution in egypt....






एक चिंगारी से
हज़ारों मशालें जल
उठीं
एक आवाज़ दिल से
निकली और
सदियों से दबी धड़कने
दहकने लगीं
एक कदम जो झूठ
को कुचलने बढ़ा
पीछे कारवां जुड़ता
चला गया....

Thursday, February 10, 2011

खोए हुए कुछ
सितारे कुछ कुछ
वैसे जैसे खोए हुए
से कुछ सपने.
बढ़ते जाते हैं
कदम उनके पीछे
कुछ कुछ वैसे जैसे
माँ का आँचल
मुट्ठी में कस के
थामे चला जाता हो
रोता हुआ सा कोई बच्चा ...