उस शहर में अब सिर्फ
वीरान राहें हैं
सुनसान घरौंदे हैं
मूर्छित पेड़ पौधे हैं
धुंध ही धुंध है चारों ओर
जाने किसने इसकी
आत्मा को इस कदर
कुचला है ...
सूने बचपन के कमरों
में हज़ारों बच्चे उम्र कैद हैं
जाने किसने इनके
सर पे छाये नीले आसमान
की छतरी को छीना है...
सूनी-सूनी सी है
डैने फैला कर बैठा है
किसने शहर की हर
दरों-दीवार को खून
से रंग दिया है??
कल रात यहाँ नफरत कि
सूने बचपन के कमरों
में हज़ारों बच्चे उम्र कैद हैं
जाने किसने इनके
सर पे छाये नीले आसमान
की छतरी को छीना है...
सूनी-सूनी सी है
हर डगर
दर-दर पे डर अपनेडैने फैला कर बैठा है
किसने शहर की हर
दरों-दीवार को खून
से रंग दिया है??
कल रात यहाँ नफरत कि
आंधी आयी थी
ऐसी घृणा भरी हवा
जिसने इंसानीयत की
रूह में घर कर
हर ख़ूबसूरत जज़्बात को
ज़हर बना दिया...
शायद यही हवा है
जिसने शहर को
मरघट सा बना दिया है.....
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