Thursday, May 31, 2012

उस  शहर में अब  सिर्फ  
वीरान  राहें  हैं 
सुनसान  घरौंदे हैं 
मूर्छित  पेड़ पौधे हैं 
धुंध  ही धुंध है चारों ओर 
जाने किसने इसकी 
आत्मा को इस  कदर 
कुचला है ...
सूने बचपन के कमरों
में हज़ारों बच्चे उम्र  कैद हैं
जाने किसने इनके
सर पे छाये  नीले आसमान
की छतरी को छीना है...
सूनी-सूनी सी है
हर डगर
दर-दर पे डर अपने
डैने फैला कर बैठा है
किसने शहर की हर
दरों-दीवार को खून
से रंग  दिया है?? 
        कल रात यहाँ नफरत कि 
       आंधी आयी थी 
       ऐसी घृणा भरी हवा 
       जिसने इंसानीयत की
       रूह में घर कर 
        हर ख़ूबसूरत जज़्बात को 
        ज़हर बना दिया...
             शायद यही हवा है 
             जिसने शहर को 
             मरघट सा बना दिया है.....
     
 
   
   



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