मन पता नहीं कहाँ कहाँ जाता है
कैसी कैसी बातों के बीच
बैठ जाता है
चुपचाप सुनता रहता है
एक मूक आगंतुक की तरह
देर तक। …
जब थकने के कारण
उसकी पलकें झपकने लगती हैं
तो वहीँ निढाल हो जाता है
बातों के बीच की
तंग जगहों में ...
फिर बिन करवटों की
जटिल नींद से झुंझलाकर
उठ बैठता है
तब तक बातें फुसफुसाहट
में तब्दील हो चुकी
होती हैं
मन अपनी उपस्थिति या
अनुपस्थिति से बेपरवाह
वहां से निकल जाता है
कहीं और के लिए
कैसी कैसी बातों के बीच
बैठ जाता है
चुपचाप सुनता रहता है
एक मूक आगंतुक की तरह
देर तक। …
जब थकने के कारण
उसकी पलकें झपकने लगती हैं
तो वहीँ निढाल हो जाता है
बातों के बीच की
तंग जगहों में ...
फिर बिन करवटों की
जटिल नींद से झुंझलाकर
उठ बैठता है
तब तक बातें फुसफुसाहट
में तब्दील हो चुकी
होती हैं
मन अपनी उपस्थिति या
अनुपस्थिति से बेपरवाह
वहां से निकल जाता है
कहीं और के लिए
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