Monday, September 29, 2014

शेष से आगे..



पर कुछ और भी है- इन लम्बे बोझिल खाली घंटों में एक उदासी, जिसे मेरा अस्तित्व महसूस करता है, जो मेरे ज़ेहन से उठ कर मेरे दिमाग में फैल जाता है।  एक कड़वी जागरूकता का आभास होता है की ये  मेरा अनुभव है पर फिर भी मेरे बाहर है, ऐसा कुछ जिसे मैं चाह कर भी नहीं बदल सकता। कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि मेरे ख्वाब मेरे सामने यूँ चले आये हैं मानो वो ख्वाब न होकर वास्तविक चीज़ें हों। वो ऐसा इसलिए नहीं करते कि वो किसी सच की जगह लेना चाहते हैं। वो उस स्तर तक उठते हैं क्यूंकि वो जताना चाहते हैं कि वो किसी भी तथ्य के बराबर हैं उससे कमतर नहीं। वो उतने ही साक्ष्य हैं जितने की कोई और जीती जागती चीज़ें हैं जीवन में।  मैं जितना ही उन्हें पीछे धकेलता हूँ वो उतनी ही उद्दण्तता से खुद के होने का एहसास कराते हैं और मुझसे छिटक कर कुछ यूँ अलग हो जाते हैं जैसे- सड़क के आखिरी कोने से ट्राम मुड़ जाती है, कई आवाज़ों को भेदती हुई रात के प्रहरी के चीखने की आवाज़ आती है, वो क्या कहता है समझ में नहीं आता पर उसकी आवाज़ अलग से सुनाई देती है, कोई अरबी आयत जो झरने सी गिरती है गंतव्य में पसरी नीरस गोधूलिका में। 
संभावित जोड़े, बक बक करती लड़कियाँ , जल्दबाजी में भागते युवक सब गुज़र रहे हैं इन रास्तो से, कुछ हैं जो ज़िन्दगी की मसरूफ़ियतो से खाली हो चुके हैं और रोज की तरह टहलने निकले हैं, कुछ एक दुकानों के  दरवाजों पे उनके मालिक इंतज़ार में खड़े हैं हर एक चीज़ से बेखबर होकर, कुछ लम्बे चौड़े कुछ दुबले पतले सैनिकों की बटालियन भी निकल रही है  यहाँ से, शोर से ज्यादा हलचल मचाते हुए, कभी कोई बहुत मामूली इंसान भी जाता हुआ नज़र आ जाता है।  समय के इस पहर में कारें काम ही दिखती हैं इस सड़क पे  और कभी-कभी एक दो कारें मधुर संगीत सुनाती हुई निकल जाती हैं।  मेरे ह्रदय में एक पीड़ा व्याप्त है जो मुझे कत्तई विचलित नही कर रही, ये धीरता मेरे सब कुछ  छोड़ देने के कारण मुझे मिली है। 
ये सब कुछ चला जा रहा है और इन सबका मेरे लिए कोई मायने नहीं है।  मेरी तकदीर से इनका कोई वास्ता नही है और न ही पूर्ण नियति के साथ।  ये सिर्फ बेखबरी है, ये उस विरोध में निकले श्राप हैं जब परिस्थितियाँ पत्थर मारती हैं, ये अंजानी आवाजों की गूंजे हैं---अस्तव्यस्त जीवन की सामूहिकता और कुछ नही। 

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