Friday, October 3, 2014

देखते! देखते !

पूरे एक साल गुज़र गए इस शहर में। मुझे नहीं मालूम कि इस शहर ने मुझे कितना अपनाया है और मुझे इस बात का भी इल्म नहीं कि मैंने इसे कितना आत्मसात किया है इन वक़्तों में। इसके रास्ते अब पहचानने लगी हूँ,
इसके चेहरों से थोड़ा वाकिफ हूँ थोड़ी अनजान हूँ। इसकी हवा में शामिल खुशबुएँ कभी मन हल्का करती हैं कभी शामें बोझिल करती हैं। पहले कभी इतना गौर नहीं किया करती थी और अब करने लगी हूँ। मुझे नहीं मालूम की ये कहाँ तक सही है की जगह के अनुसार लोगों का सामान्यीकरण किया जाये, पर ऐसा करना शायद जल्दबाजी है।  हर जगह अच्छी और बुरी बातें हुआ करती  हैं। हमारे एहसास हमारी परिस्थितियों के मुताबिक बनते बिगड़ते रहते हैं और कई उम्र लग जाती है कोई एक ठोस नजरिया बनाने में। यहाँ कुछ अंजानी परिस्थतियों से मेरा राबता हुआ और उनके कारण मुझे कुछ एक ऐसे लोग मिले जो मुझे बेहद संजीदा और मर्मस्पर्शी मालूम हुए। फिर दूसरी हीं तरफ ऐसे लोगों को भी करीब से देखने का मौका मिला जो जीवन की बहुत सामान्य और मामूली खूबियों से भी मरहूम लगे मुझे , उनमे कड़वाहटों और स्वार्थ की गंध इस कदर मिली की इंसानियत जैसे ख़ूबसूरत लफ़्ज़ पे भरोसा थोड़ा टूटने सा लगा पर टूटा नहीं है और उम्मीद बाकी है :) इस शहर में अपने रास्ते मैंने खुद ढूंढें कभीइ  दोस्तों कभी अजनबियों की मदद लेते हुए, कभी भटकते हुए सही रास्ते मिले हैं और कभी सही रास्तों के भुलावे में अँधेरी गलियों से भी गुजरी।  
कुछ सपनों से छुपकर यहाँ आई थी वो ख्वाब अभी भी पीछे हैं, मेरी तम्मना है उसे उसकी मुस्तकबिल तक ले कर जाऊँ और फिर अलविदा कहूँ इसके पहले कि ये नया शहर पुराना होने लगे मेरे लिए..... 

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