२ --
जिससे मैं घृणा करता हूँ मुझे उसे इख़्तियार करना है ---ख्वाब देखना, जिसे मेरा विवेक घृणा करता है ; या फिर काम करना, जिसे मेरी संवेदना घृणा करती है। काम, जिसके लिए मैं समझता हूँ मैं नहीं जन्मा हूँ या फिर ख्वाब देखना, जिसके लिए कोई भी नहीं जन्मा। दोनों से मैं घृणा करता हूँ इसलिए इनमे से किसी को नही चुनता हूँ, पर कई बार मुझे ख्वाब बुनने पड़ते हैं और कई बार काम के बोझ को ढोना पड़ता है। मैं दोनों को अक्सर मिला लेता हूँ अपनी सुविधानुसार।
३ --
शहर में गर्मियों की ढलती शामों में पसरा ठहराव में मुझे बेहद अजीज़ है , ये स्थिरता शहर के कोलाहल और हलचल की तुलना में ज्यादा तथस्ट है। Rua do Arsenal, Rua do Alfandega, और पूर्व की ओर बढ़ती जाती वो उदास राह जहाँ Rua do Alfandega के रास्ते मुड़ते हैं, खामोश खड़े बंदरगाह के पास से गुज़रती राह , इन सब में ठहरा दुःख मुझे सुकून देता है जब जब मैं यहाँ से गुज़रते हुए इनके एकाकीपन से मिलता हूँ। जिस दौर में मैं जी रहा हूँ उसके ठीक पुर्व के दौर में मैं फिसल जाता हूँ और इस बात से खुश होने लगता हूँ की मैं Cisario Verde के समय में पहुँच गया हूँ , हालांकि मेरे पास उनके जैसी कविता नहीं है पर उनकी कविताओं में मौजूद भाव को मैं अपने भीतर महसूस करने लगता हूँ। इन सड़को पे चलते हुए जब तक रात गहरा न जाये मुझे ये एहसास होता है कि मेरी ज़िन्दगी उनके जैसी है। पूरे दिन वो अर्थहीन गतिविधियों में मसरूफ होती है और रात के आने के साथ अर्थहीन शून्यता से भर जाता है। दिन में मैं कुछ भी नही होता और गहन रात में मेरा खुद मुझसे मिलता है। मुझे इन तमाम राहों में और मुझमे कोई फर्क नज़र नहीं आता, बस ये कि ये राह है और मेरा मैं एक रूह जिसका कोई महत्व नही क्यूंकि इसमें कोई तत्व नहीं। वस्तु और व्यक्ति को एक ही तरह की अमूर्त किस्मत मिली है, दोनों दुनिया के किसी रहस्यमयी बीजगणित के सवाल को हल करते हुए एक जैसी उदासीन मंज़िल की ओर अग्रसर हैं....
… शेष
No comments:
Post a Comment