एक नया अध्याय -१
ये एक कोशिश है Fernando Pessoa की आत्मकथा The Book of Disquiet का अनुवाद करने की, कुछ अपने तरीके से ...
बेचैनियों की किस्सागोई
मैं हतप्रभ रह जाता हूँ जब भी कुछ खत्म करता हूँ। हैरानगी और तकलीफ दो जज़्बात एकसाथ मुझे घेर लेते हैं। मेरी पूर्णतावादी वृत्ति को मुझे कुछ भी ख़त्म करने से रोकना चाहिए, उसे तो मुझे कुछ शुरू करने से भी रोकना चाहिए। मैं हूँ जो हमेशा विचलित होकर कुछ न कुछ शुरू कर देता हूँ और खुद को उलझाए रखता हूँ। ऐसा करने से जो कुछ हासिल होता है वो मेरी इच्छा से प्रेरित हुए मेरे काम की वजह से नहीं बल्कि मेरी इच्छा के समर्पण के कारण होता है। मैं शुरुआत करता हूँ क्यूंकि मेरे भीतर और सोचने की शक्ति नहीं होती, मैं खुद को कमज़ोर पाता हूँ, कुछ भी सोचने समझने के लिए और मैं खत्म करता हूँ क्यूंकि मेरे अंदर कुछ अधूरा छोड़ कर भागने का साहस नहीं होता। ये किताब मेरी ऐसी ही किसी कमज़ोरी या कायरता की उपलब्धि है।
बेतरतीब, अनियमित खयालों में, जिन्हे अव्यवस्थित रखने के अलावा मेरी कोई और इच्छा नहीं, मैं निरपेक्षता के साथ अपनी आत्मकथा बयां कर रहा हूँ, मेरी नज़र में मेरा निर्जीव इतिहास। ये मेरी संस्वीकृति है और अगर इसमें 'मैं' कुछ नहीं कह रहा हूँ तो वो इसलिए क्यूंकि मेरे पास असल में कहने को कुछ भी नहीं।
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