Wednesday, October 8, 2014

पेसोआ की आत्मकथा - 

छंठा अध्याय

ज़िन्दगी से बहुत कम की गुज़ारिश की है और जिंदगी ने मुझे उतने से भी मरहूम रखा है।  क्या चाहा ?-एक छोटी सी जमीं, धुप की एक किरण , थोड़ा सा सुकून और जितने से भूख मिटे बस उतनी रोटी और अपने होने के एहसास तले मैं न दबूं , लोगो से कोई उम्मीद न हो और न ही लोग मुझसे कुछ चाहें या अपेक्षा करें -मुझे ये भी नसीब नहीं, जैसे किसी भिखारी को एक आना भी नहीं मिलता इसलिए नहीं कि लोग स्वार्थी और बेरहम होते हैं पर  इसलिए क्यूंकि उनके अंदर कोट के बटन खोलने की कोई प्रबल इच्छा नहीं जागती। 
अपने ख़ामोशी रवां कमरे में मैं बैठा लिख रहा हूँ, अकेला हूँ यहाँ और हमेशा ही अकेला रहूंगा। मैं सोचकर हैरान होता हूँ की मेरी  नगण्य आवाज़ उन हज़ारों आवाज़ों के मर्म को समाविष्ट करने में सक्षम न हो, हज़ारों ज़िन्दगियों की स्व अभिव्यक्ति की अभिलाषा, लाखों आत्माएं जो मेरी तरह ही रोज़मर्रा के कामों में खोयी  हुई हैं , उनके निरर्थक ख्वाब और उनके निराशात्मक उम्मीदें। इन घड़ियों में मेरी धड़कने बढ़ सी जाती हैं क्यूंकि मैं इन सब उलझनों से अभिज्ञ होने लगता हूँ। मैं ज्यादा जीवित महसूस करने लगता हूँ ,जैसे किसी खुमार में। मेरे भीतर मैं कोई आध्यात्मिक ओज महसूस करता हूँ।  एक दुआ निकलती है किसी हुजूम की चीख की तरह।  पर मेरा ज़ेहन ,तुरंत, मुझे मेरी जगह पे ला पटकता है और मैं खुद को ऊंघती निगाहों से देखता हूँ। मैं इन आधे अधूरे लिखे पन्ने से अपनी नज़र उठा करअपने जीवन को देखता हूँ, व्यर्थ  और किसी भी खूबसूरती से वंचित जीवन, फिर अपनी सस्ती सिगरेट को देखता हूँ जिसे मैं बस ऐशट्रे में  बुझाने ही वाला हूँ इन कागज़ों पे सोखते लफ़्ज़ों में जब्त किसी युद्ध की विवेचना से परे। 
इस चौथे मंजिल पे स्थित मेरे कमरे में मैं जीवन को खंगाल रहा हूँ।  कह रहा  हूँ आत्मव्यथा , किसी मशहूर लेखक या बुद्धजीवी की भाँति कहानी बुन रहा हूँ।  मैं, यहाँ अपूर्व हूँ ......

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