Saturday, September 20, 2014

१ -शुरू से....

मैं समय के उस दौर में दुनिया में आया जब ज़्यादातर नौजवानो का ईश्वर पर से विश्वास खो रहा था  ठीक उसी  कारण जिसकी वजह से बुजूर्गों का उसपे विश्वास बरकार था, बिना ये जाने कि 'क्यों '? क्यूंकि इंसान कुदरती तौर पे अपनी धारणाएँ अपने जज़्बात की नींव पे बनाता  है  न कि चेतना या तर्क की ज़मीं पे परख कर इसलिए इन नौजवानों ने इंसानियत को ईश्वर की जगह पे तवज्जो देना शुरू कर दिया है। हालाँकि, मैं एक ऐसा बंदा हूँ जो हमेशा से उन चीज़ों के किनारे खड़ा रहा हूँ जिनसे मैं  जुड़ा हुआ हूँ, मैं सिर्फ  उन सारी चीज़ों को गौर से नहीं देखता हूँ जिनके बीच मैं फंसा हूँ बल्कि उनके आस पास फैले विस्तार को भी देखता हूँ। शायद  यही वजह है कि मैंने ईश्वर को पूरी तरह नहीं छोड़ा है जैसे औरों ने कर रखा है।  मैंने ये विचार किया है कि ईश्वर असंभावित है पर उसका होना भी उतना ही लाज़िमी है इसलिए उसकी इबादत की जा सकती है, वहीँ, इंसानियत सिर्फ एक जैविक अवधारणा है और ये उससे कत्तई भिन्न नहीं है जिन जीव प्रजातियों में हम सब शामिल है, इस लिहाज़ से इंसानियत किसी इबादत के लायक नही है ठीक वैसे ही जैसे अन्य जीव प्रजातियाँ नहीं होते। आज़ादी और समानता के संस्कारों में  रचा बसा इंसानियत का पंथ मुझे हैरान करता है और मुझे ऐसा लगता है कि ये उन प्राचीन पंथों का पुनरुद्धार है जिसमे देवता जीवों जैसे होते थे या फिर जिनके चेहरे जीवों की तरह  होते थे। 
बहरहाल, मुझे नहीं मालूम की ईश्वर या  जीव  में भरोसा कैसे करते हैं इसलिए मैं उन और लोगों की तरह जो हाशिए पे रहते हैं, इन दोनो चीज़ों से एक दूरी बनाये रखी है एक ऐसी दूरी जिसे आम भाषा में पतन कहा जाता है।  अचेतना का पूरी तरह नाश होना ही पतन है जो कि जीवन का मूल स्त्रोत है। जो अगर वो सोचने लगे तो ह्रदय धड़कना बंद कर देगा। 
वो कुछ लोग जो मेरी तरह जीते हैं बिना ये जाने की ज़िन्दगी को कैसे अपनाते हैं उनके लिए क्या बचता है सिवाय आत्मत्याग का रास्ता अपनाने के और अपनी तक़दीर का अवलोकन या  विवेचना करने के ?

No comments:

Post a Comment