Thursday, June 6, 2013


जिस पल की 

अनकही अनसुनी 
अनजानी डगर 
में यूँ ही कभी कभी 
लड़खड़ाते हुए कदम
लगते हैं गुजरने 

जिस उम्मीद की 

बेपरवाह, बेख़ौफ़ 
बेमानी नज़र 
में यूँ ही हौले हौले 
सुरमई से  ख्वाब 
लगते हैं संवरने 

उस पल, उस उम्मीद 

की चमकीली पन्नी 
वाली पतंग  
आज कट कर 
जा फंसी है बिजली के  
के उलझे तारों में 
अब किसी तरकीब से 
उसे छुड़ाने 

हम ----


भर रहे हैं  चोरी चोरी 

हर दिन थोड़ा थोड़ा 
ज़िन्दगी के प्याले  में 
ह्रदय की नज़रों से बचाकर 
कतरा -कतरा धड़कने ....


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