मैं अब
ख्वाब में भी संभल कर
चलती हूँ
वहां भी
इधर ऊधर
आस पास
पहले देखती हूँ
फिर दरवाज़े कस के बंद करती हूँ ...
खिडकियों से अब
सूर्य की किरणों
का आना जाना
बंद कर दिया है
रात को छत की
मुंडेर से टिककर तारों को
टकटकी लगाये
देखना छोड़ दिया है
खेतों में खिल आये
सरसों के पीले पीले
फूलों को अपने न
होने का ख़त लिख
भेज दिया है .....
--जब से
सुना है गाँव गाँव शहर शहर
में बेटियों की सुरक्षा
के लिए सब ने कमर कस ली है
क्या ये पहरेदारी बढ़ने
का संकेत है या
एक नई सोच की
संरचना में उठा पहला कदम ?
फिलहाल मैं परेशान हूँ ........
ख्वाब में भी संभल कर
चलती हूँ
वहां भी
इधर ऊधर
आस पास
पहले देखती हूँ
फिर दरवाज़े कस के बंद करती हूँ ...
खिडकियों से अब
सूर्य की किरणों
का आना जाना
बंद कर दिया है
रात को छत की
मुंडेर से टिककर तारों को
टकटकी लगाये
देखना छोड़ दिया है
खेतों में खिल आये
सरसों के पीले पीले
फूलों को अपने न
होने का ख़त लिख
भेज दिया है .....
--जब से
सुना है गाँव गाँव शहर शहर
में बेटियों की सुरक्षा
के लिए सब ने कमर कस ली है
क्या ये पहरेदारी बढ़ने
का संकेत है या
एक नई सोच की
संरचना में उठा पहला कदम ?
फिलहाल मैं परेशान हूँ ........
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