Saturday, January 12, 2013

ज़िन्दगी के कमरों 
में सब कुछ 
बेतरतीब बिखरा हुआ 
सा है 
यहाँ-वहां, जहाँ-तहां 
लम्हों पे धुल ही धुल है 
पर- बेफिक्री का 
आलम कुछ यूँ है की -
कोई  ख्वाहिश या ख़्वाब 
आज कल दस्तक दे तो 
दिल दरवाज़ों के पीछे से 
पूछता है-
क्या ठीक करूँ?
क्या फेंक दूँ ?
क्या थाम लूँ?
क्या छोड़ दूँ ?
क्या दुआ करूँ ?
क्या क़त्ल करूँ?
क्या दांव लगाऊं ?
क्या गँवा दूँ ?
क्या छीन लूँ ?
क्या दान करूँ ?
क्या प्यार करूँ?
क्या नफरत करूँ?
 क्या रुक जाऊं ?
 क्या चलती रहूँ?
क्या वक़्त लूँ ?
क्या भागने दूँ ?
क्या आने दूं ?
 क्या अलविदा कहूँ ?

ख्वाब और ख्वाहिश तो 
मेहमान हैं 
आते हैं, उल्टे पाँव 
 लौट  जाते हैं 

      एक ज़िन्दगी है जो 
     बेफिक्र और बेपरवाह 
    नींद से जाग उठती है 
    और कमरों की 
    बिखरी चीज़ों में कहीं 
   इन सवालों के जवाब 
   ढूँढने लगी है 
   यूँ ही बेवजह जाने क्यूँ ?

1 comment:

  1. in an age of exceptional choices & emotional distresses, the familiarly quizzical mind (& heart) evolves and twists with every 'or'. good one Subbu.

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