सदियों से
बंद दरवाज़ों के पीछे
दीवारों पे ठुकी
कीलों पे टंगी
खुबसूरत तस्वीरों
में रचे
हर चेहरे
में वो खौफ
कैद था
किसी ढलते सूरज
के नीचे बने
सागर में
अनगिनत आंसुओं
के मोती
सीपियों में
बंद थे...
डर में
लिपटे
लिबास को चेहरे से
सरकाया
घर की खिडकियों
को खोला
और हर
तस्वीर आजादी
चाहने लगी
औरत सतह
से उठ
कर उड़ने
को तैयार
होने लगी....

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