Wednesday, February 23, 2011

ओर छोर....

जाने किस ओर
बढ़ते जाते हैं
कदम...
न दिमाग को
है खबर
और न
जाने मेरा मन..

सपने और हकीकत
कुछ यूँ
उलझे हुए हैं
परत दर परत
जैसे आइने में
अपनी सूरत
में नज़र आये
कोई और सूरत....


आँखों पे
ढल-ढल आती 
है
चिर अंधकारमय
सी रात...
जैसे शब्दों
में न बंध
पाती हो
कोई 'चुप' सी बात.....



1 comment:

  1. oh!!!
    lovely words penned down so beautifully
    each line speaks for itself
    can jus say
    SIMPLY BEAUTIFUL & AMAZING

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