Thursday, December 29, 2011

रह रह कर 
धूल उड़ाती
आंधियां 
आती तो हैं यूँ
की लगता है 
जड़ों से उखड़ 
जायेंगे कई ज़ब्त
एहसास 
पर-- 
    आंधियां तो गुज़र 
    जाया करती हैं 
    छोड़ते हुए धूल और 
    मिट्टी की परतें 
    और गहरी धस्ती
    जाती हैं वो जड़ें 
और--
      सतह पे खड़े ठूंठ 
      को देखकर हर 
      आगंतुक उसकी 
      उम्र आंकता है 
      अनजान इस बात से
      की कुछ सूखे पत्ते
      उसके कदमों
      तले दबे हैं....
      
      



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