रह रह कर
धूल उड़ाती
आंधियां
आती तो हैं यूँ
की लगता है
जड़ों से उखड़
जायेंगे कई ज़ब्त
एहसास
पर--
आंधियां तो गुज़र
जाया करती हैं
छोड़ते हुए धूल और
मिट्टी की परतें
और गहरी धस्ती
जाती हैं वो जड़ें
और--
सतह पे खड़े ठूंठ
को देखकर हर
आगंतुक उसकी
उम्र आंकता है
अनजान इस बात से
की कुछ सूखे पत्ते
उसके कदमों
तले दबे हैं....
धूल उड़ाती
आंधियां
आती तो हैं यूँ
की लगता है
जड़ों से उखड़
जायेंगे कई ज़ब्त
एहसास
पर--
आंधियां तो गुज़र
जाया करती हैं
छोड़ते हुए धूल और
मिट्टी की परतें
और गहरी धस्ती
जाती हैं वो जड़ें
और--
सतह पे खड़े ठूंठ
को देखकर हर
आगंतुक उसकी
उम्र आंकता है
अनजान इस बात से
की कुछ सूखे पत्ते
उसके कदमों
तले दबे हैं....
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