Saturday, December 17, 2011

मन की दीवारों
पे बढ़ते  दरख्तों 
को देखकर महसूस 
होता है 
जैसे बीतती हुई
उम्र के लम्हों 
से गिरे बीज 
साल दर साल 
मेरे होने के निशाँ 
अपनी जड़ों में
ज़ब्त करते रहेंगे...
बारिश के मौसमों 
में जब भी गीली 
होगी ये दीवार
ये दरख़्त 
बूंदों को यूँ ही सोखते 
रहेंगे--
      इन्हें भी अपने होने का 
      गुम़ा जो है.......

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