मन की दीवारों
पे बढ़ते दरख्तों
को देखकर महसूस
होता है
जैसे बीतती हुई
उम्र के लम्हों
से गिरे बीज
साल दर साल
मेरे होने के निशाँ
अपनी जड़ों में
ज़ब्त करते रहेंगे...
बारिश के मौसमों
में जब भी गीली
होगी ये दीवार
ये दरख़्त
बूंदों को यूँ ही सोखते
रहेंगे--
इन्हें भी अपने होने का
गुम़ा जो है.......
पे बढ़ते दरख्तों
को देखकर महसूस
होता है
जैसे बीतती हुई
उम्र के लम्हों
से गिरे बीज
साल दर साल
मेरे होने के निशाँ
अपनी जड़ों में
ज़ब्त करते रहेंगे...
बारिश के मौसमों
में जब भी गीली
होगी ये दीवार
ये दरख़्त
बूंदों को यूँ ही सोखते
रहेंगे--
इन्हें भी अपने होने का
गुम़ा जो है.......
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