आईने में उतर
आती है जो छवि
वो दीखता तो मुझसा
है
पर उसके ज़ेहन
में पनपते सवाल यकीनन
भिन्न हैं..
अक्सर उस मै से
बहस छिड़ती है
वो अचरज से मेरी
ओर देखकर पूछता
है क्यूँ
मेरे माथे पे उभरी
लकीरें परेशान दिखती हैं...
मेरे हाथ बरबस ही
माथे पे चले जाते हैं
कुछ कह न पाने की
विवशता मुझे कचोटती है
और प्रश्नसूचक दृष्टि से
मै को देखती हुए
पूछती हूँ क्यूँ
उसके होठों पे
आई मुस्कान अधूरी सी
लगती है....
दोनों ही मौन में
घुलते हैं
अवाक् कुछ छड़
और एक साथ
आँखें मूँद लेते हैं.......
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