Sunday, August 28, 2011

आईने में उतर
आती है जो छवि 
वो दीखता तो मुझसा 
है 
पर उसके ज़ेहन 
में पनपते सवाल यकीनन 
भिन्न हैं..
अक्सर उस मै से
बहस छिड़ती है
वो अचरज से मेरी
ओर देखकर पूछता 
है क्यूँ
मेरे माथे पे उभरी 
लकीरें परेशान दिखती हैं...
मेरे हाथ बरबस ही
माथे पे चले जाते हैं
कुछ कह न पाने की
विवशता मुझे कचोटती है
और प्रश्नसूचक दृष्टि से
मै को देखती हुए 
पूछती हूँ क्यूँ
उसके होठों पे
आई मुस्कान अधूरी सी
लगती है....


दोनों ही मौन में 
घुलते हैं 
अवाक् कुछ छड़
और एक साथ
आँखें मूँद लेते हैं.......


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