Thursday, August 4, 2011

सागर की 
ऊँची नीची 
घटती बढती 
इठलाती लहराती 
साहिलों से 
मिलती बिछड़ती 
लहरों से परे
कहीं गहराईयों 
की असीमित 
खामोशियों के
भंवर में 
उलझा मौन 
सुलझने  को बेचैन है......

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