Wednesday, August 24, 2011

कितने ही हाथ आज 
पताका लिए उठे हुए है
सड़कों पे उमड़ आया 
है हुजूम लोगों का 
इनकी जुबाँ पे 
देश की 'दूसरी आजादी' 
का नारा गूंज
रहा है...
तेज़ी से बदलते समाज
और उसके मीडिया तंत्रों
की माने तो 
सब कुछ ठीक ठाक ही
लगता है
ये देशहित की भावना से
ओतप्रोत हैं 
अभिव्यक्त करने की 
आज़ादी का ये एक
बेहतरीन नमूना है...


पर....


प्रजातंत्र की नींव 
पर उमड़ी ये भीड़ और
आवाज़ सवालों  से परे
नहीं....
वो सवाल जो इन्होने 
पूछने ज़रूरी नहीं
समझे 
वो सवाल जिनके जवाब 
इनके मसीहा ने सोचे नहीं
.....अगर एक व्यक्ति ही पूरा देश बन गया
.. फिर क्या  उस देश को संविधान की नहीं
....सिर्फ एक सुदर्शन चक्र की ज़रुरत होगी???
    !!!!






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