Friday, July 29, 2011

भोर होती नहीं
और आँगन में 
झाड़ू बुहारने की
आवाज़ 
कानो में शिरकत करने 
लगती है,
फिर शुरू होती 
है बर्तनों से जंग
अंगीठी से निकलता
धुआं खिडकियों के 
रास्ते घुस कर 
बता जाता है
की रोटी सिकने 
की तयारी हो चुकी है
कौवे भी अपनी
अपनी कांव-कांव से
सुबह को और थोडा 
जीवंत बनाकर 
उड़ जाते हैं....
चुन्नी के रोते 
ही पता चलता है
उसकी चोटी कस
कर बाँधी जा रही है...
हुक्के की गड़ गड़  
ये संदेसा लाती  है
है की 
दद्दू सुबह की सैर 
से लौट आयें हैं
दादी के मुख 
से निकलते राम-राम 
की धूनी
ये बता जाती 
है की उसे चाय 
आज भी देर से मिली है...
मैं भी धीरे से उठ
कर स्नानघर में 
घुस जाता हूँ ... 
             और जिसके उठते ही 
             दिन के शुरू होने 
             की खबर देने लगती 
             हैं  ये सारी ध्वनियाँ 
             मैं हर रोज़ उसे 
             चुपचाप भूल जाता हूँ.....
             




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