Wednesday, July 6, 2011

मेरे समय
के आँगन में
कई हिस्से हैं
और हर हिस्से में कई किस्से
छिपे हैं
कहीं सर्दी में गिरती
धूप की किरने कैद हैं
तो कहीं बारिश की कुछ
बूंदे छम छम करती हैं,

कहीं किसी कोने में u
क ख ग... a b c d
के वो सबसे पहले
सीखे हुए   स्वर गूंजते हैं
तो उधर कहीं किसी पुराने से बक्से में
बचपन में सुनी कहानियो
पे रचे नाटक आज
तक खेलते हैं
कहीं किसी हिस्से में दोस्तों
से हुई अनबन की गांठे हैं
वहीँ कहीं साथ में
कुछ दोस्तों की मस्ती भरी यादें भी हैं
पुरानी तस्वीरों से झांकते चेहरे
पूरी मासूमियत से आज की
तरफ देखते हैं
मैं गिरती पड़ती दौड़ती भागती सी
उन सारी गलियों में घूम कर आती हूँ
जहाँ जहाँ से छोटी आँखों में उतरे
कई टेढ़े मेढ़े छोटे बड़े सपने
घर से निकल कर गुज़रे थे.
बस अभी अभी आ कर रुकी हूँ
थमी हूँ, आज के सिरहाने पर
एक झपकी ले लूँ
फिर चलूंगी  अपने समय की सैर पर.......
 

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