वक़्त ने कब
कैसे और कहाँ
बदल ली थी
अपनी चाल
ये इल्म
ही नहीं हुआ...
हाँ ! उसे गुज़र
जाना ही था
आज- कल की
आँख मिचौली में
इस बात का
हर मोड़
पे ज़िक्र था....
ये ज़ाहिर नहीं की
मैं वक़्त से
या वक़्त मुझसे
बचता रहा
ग़म सिर्फ इतना
है की
मैं वक़्त को ढूंढकर
अपने दिए उधार
वापस ले न सकी...
ये भी हुआ यूँ की
वक़्त की सजाईबिसात पर
मैं एक पैदल बनी
और ठहरी रही........
No comments:
Post a Comment