Tuesday, June 28, 2011

वक़्त ने कब 
कैसे और कहाँ 
बदल ली थी 
अपनी चाल 
ये इल्म
ही नहीं हुआ...
हाँ ! उसे गुज़र 
जाना ही था 
आज- कल की
आँख मिचौली में
इस बात का 
हर मोड़ 
पे ज़िक्र था....
ये ज़ाहिर नहीं की 
 मैं वक़्त से 
या वक़्त मुझसे 
बचता रहा
ग़म सिर्फ इतना 
है की 
मैं वक़्त को ढूंढकर
अपने दिए उधार
वापस ले न सकी...
ये भी हुआ यूँ की 
वक़्त की सजाई
बिसात पर
मैं एक पैदल बनी
और ठहरी रही........ 




 



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