Saturday, June 11, 2011

सुबह तक
जागी आँखों
को थोडा और
खोलती हूँ
खिड़की की
ओर कदम
खुद बखुद
बढ़ते हैं
ये सोचते हुए
की शायद
सूरज भी
ओंधे मुंह
पड़ा दिख जाये
कल रात
ही चाँद
के साथ साजिश
की थी
कि सुनहले दिनों
को मुट्ठी में
कैद किया जाये.....

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