Thursday, November 15, 2012

क्यूँ थक हार जाता हूँ मैं 
     जब जब देखना चाहा मैंने 
     सागर आकाश धरती 
     पहाड़, सूरज, चाँद 
     फ़ूल और तारों 
     से बहुत दूर कुछ और .....
क्यूँ खोने लगता हूँ मैं 
    जब-जब पाना चाहा मैंने 
    यश, नाम, धन 
    सफलता, धीरज, ख़ुशी 
    और उम्मीद की 
    सीमाओं से परे कुछ और .....
क्यूँ टूटने लगता हूँ मैं 
   जब-जब तोड़ना चाहा मैंने 
   नियम, काएदे , उसूल 
   बंधन, जेल, और समाज 
   की ज़ंजीरों से भी मज़बूत कुछ और ....
           क्या इतना कमज़ोर है जीवन 
           जो रह -रह कर बिखर जाता है?
           या फिर इतना तथस्ट की 
           सब कुछ हार कर भी 
           जीत लेता है जीवन से भी 
           उज्जवल कुछ और ..........
   

    

1 comment:

  1. ye toh mere upar ekdum fit hai abhi :)

    gud one again.
    kp playing with words...it's fun.

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