काश
कहने सुनने की
आदत न लगी होती
तो आज खोने
का आभास न होता
स्टेशन पे उमड़ी
भीड़ में दीखते
हज़ारों चेहरों में
कोई चेहरा अपना तो न लगता
चारो तरफ बिखरे
शोर में
इक आवाज़ का दर्द
मेरे कानों में शीशे सा
तो न पिघलता......
कहने सुनने की
आदत न लगी होती
तो आज खोने
का आभास न होता
स्टेशन पे उमड़ी
भीड़ में दीखते
हज़ारों चेहरों में
कोई चेहरा अपना तो न लगता
चारो तरफ बिखरे
शोर में
इक आवाज़ का दर्द
मेरे कानों में शीशे सा
तो न पिघलता......
hmmmm..................
ReplyDeletewith every poem u r maturing and being more sensitive
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