Monday, January 9, 2012

काश
कहने सुनने की
आदत न लगी होती 
तो आज खोने 
का आभास  न होता
स्टेशन पे उमड़ी 
भीड़ में दीखते 
हज़ारों चेहरों में 
कोई चेहरा अपना तो न लगता 
चारो तरफ बिखरे 
शोर में 
इक आवाज़ का दर्द 
मेरे कानों में शीशे सा 
तो न पिघलता......

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