अब नहीं जाते
हैं कदम
उन राहों
की तरफ
की जहाँ
लगा करता था
अपने से लगने
वालों का मेला.
अब नहीं ढलती
है कोई शाम
ऐसी की जिसके
ज़िक्र में ठन्डे
हो जाया करते
थे चाय के प्याले.
अब नहीं ठहरते
हैं यादों की बस्ती में
की जहाँ चोरी से
पौकेट में
डाल लिए थे
दो चार तारे......
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