कई बार
सोचा
दो चार
कदम चलकर
बुरे समय
के बाँध
को लांघ जाऊं
पर दुःख
की एक गहरी
नदी
की ठहरी नज़र
ने मुझे
ऐसा करने से
हर बार रोका
है...
कहते सुना-देखा
और इतिहास ने
बयां किया
की नदियों
ने सभ्यताओं को
जन्म दिया
जीवन को
प्रवाह दिया..
पर कुछ तो
हुआ
जो जीवन
की गति
पे अवरोध सा
लग गया
क्या हुआ गलत
इसकी व्याख्या
अभी बाकी है.....
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