क्या पता
मुझे की
मैं कहाँ हूँ?
वहां हूँ
उस खिड़की के पास
जिसके
रास्ते मेरे ख्वाब
हवा में घुल गए थे?
या,वहां उस
दीवार के पास
खड़ी हूँ...
जिसपे उभरी
कुछ रेखाओं
को आकार दिया था?
वहां हूँ
उस कलम
की स्याही में
जिनसे हजारों
गलत जवाब लिखे
जीवन के जटिल
सवालों के?
या वहां हूँ
उस किताब के
पन्नों में
जिनके शब्दों
के अर्थ
बदलते रहे
मौसम की तरह.....
उस खिड़की के पास
जिसके
रास्ते मेरे ख्वाब
हवा में घुल गए थे?
या,वहां उस
दीवार के पास
खड़ी हूँ...
जिसपे उभरी
कुछ रेखाओं
को आकार दिया था?
वहां हूँ
उस कलम
की स्याही में
जिनसे हजारों
गलत जवाब लिखे
जीवन के जटिल
सवालों के?
या वहां हूँ
उस किताब के
पन्नों में
जिनके शब्दों
के अर्थ
बदलते रहे
मौसम की तरह.....
excellent.... subbu:)
ReplyDeletewonderful....
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