कभी भी
कहीं भी
खींच ली
जाती है
और दिन के
उजालों
में भर दी जाती
है उसके लिए
घुप अंधेरों सी
सांसें..
उसकी हर आह
पे लागे दिए
जाते हैं
ताले
तार-तार हुए
उसके जिस्म
से उतार दिया
जाता है
वो जार-जार
हुआ सा आँचल
हर दिन
वो लज्जित की
जाती है
घर में
रास्तों पे
कानून और सभ्यताओं
की आड़ में......
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