Thursday, October 6, 2011

छन-छन कर 
गिरती ज़िन्दगी
को भर-भर
कर पिया
और पल-पल
को डाला 
हौले-हौले 
गुल्लक में.....
बेसब्र मन को
थपकियाँ दीं रातों में
बेचैन निगाहों को
रिश्वतें दीं 
मुक्कमल हों जो 
ऐसे ख्वाबों की....
मगर फिर भी
वो रात दबे
पाँव आया 
चुरा कर न जाने 
कहाँ  ले गया 
गुल्लक को?
शायद चाँद पे ले 
गया था  वो उसे  
क्यूंकि----
...जब एक झटके में 
   उसने तोडा होगा गुल्लक 
   तब हज़ारों हज़ार पल 
   ठिठुर कर बिखर गए थे 
   चारों ओर
   उस रात मेरी नींद 
   भी टूटी थी
........कहते हैं चाँद पे 
       ज़मीं ठंडी होती है
      और साँसों से धुआं
      निकलता है.......



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