Saturday, December 19, 2015

बीतना !

बीतना !
यकीनन, बहुत सारा वक़्त गुज़र गया जब आखिरी पोस्ट लिखा था, पुरे एक वर्ष, पर ज़िन्दगी में कुछ खास बदलाव नहीं आया, इसका शुक्र करूँ या विचार, इसका निर्णय शायद लिखते वक़्त कर पाऊँ। वक़्त की एक खासियत ये है की ये अपने आने जाने का हिसाब बड़ी ही खूबसूरती से कहीं हिफाज़त से रखता जाता है और एक बुराई ये की ये हमें अपनी गुमशुदगी की खबर बहुत देर से देता है।  हम ढूंढने तो लगते हैं वक़्त को और वो सामने हो कर भी हमारा नहीं होता।  खैर, वक़्त की इसी लुक छिपी के खेल पर फर्नांडो पेसोआ की किताब (The Book of Disquiet) में एक अंश पढ़ा, जो काफी दिलचस्प लगा, सामान्य जीवन की आपा धापी में ही छुपे कुछ नगण्य एहसास, जिनके पास से हम यूँ ही गुजर जाते हैं, पेसोआ ने उन्हीं बेहद साधारण से तजुर्बों  को शब्दों में पिरोया है।  मेरी एक और कोशिश उस अंश को अपनी ज़ुबान में लिखने की --
The Book of Disquiet, verse 197, page:173

बीते हुए वक़्त के गलियारों में मैं अत्यंत कष्ट से गुजरता हूँ।  जो कुछ पीछे छोड़ता जाता हूँ उसमे मेरी न जाने कितनी ही अत्युक्त भावनाएँ निहित होती हैं हमेशा, वो एहसास किसी भी चीज़ से जुड़े हुए हो सकते हैं, जैसे, चाहे वो उदासीन कमरा जहाँ मैं केवल छ: दिनों के लिए ठहरा था, या, फिर वो स्टेशन का प्रतीक्षालय जहाँ मैंने दो ही घण्टे व्यतीत किये थे ट्रेन के इंतज़ार में।  हाँ, इन सभी का छूटना मुझे दुखी कर जाता है। जीवन की कुछ ख़ास चीज़ें- जब वो छूट जाती हैं और मैं पुनः उनके बारे में सोचता हूँ  प्रचूर संवेदनाएं मुझे छू जाती हैं , और एक विशिष्ट एहसास घिर कर आता है की मैं उन्हें फिर कभी भी देख या नहीं पा  सकूँगा,  कम से कम उस छण में वस्तुतः उसी तरह तो कभी नहीं। ये एहसास मेरे आतंरिक अस्तित्व को गहन पीड़ा से भिगो देता है।  मेरी आत्मा पे एक गहरी दरार सी पड़ जाती है और तीखी हवा उस ईश्वरीय पल में मेरे मुरझाये चेहरे को छूती हुई निकल जाती है।  समय! अतीत ! कोई आवाज़, कोई संगीत, कोई खुशबू-जैसे पर्दा उठाती है मेरी रूह में ढकी छुपी स्मृतियों पर से ....वो जो मैं था और जो मैं कभी और नहीं हो सकता, वो जो मेरे पास था और जो मैं कभी और नहीं पा सकता।  सत्वहीन! वो लोग जो अब नहीं हैं, जिन्होंने मेरे बचपन में मुझे प्यार किया, मैं उन्हें जब याद करता हूँ एक सिहरन से बिखरने लगता हूँ , और सभी हृदयों से निर्वासित सा महसूस करता हूँ ।  किसी दयनीय भिखारी की तरह रो पड़ता हूँ बंद दरवाज़ों की घोर चुप्पी के सम्मुख.....

1 comment:

  1. आपने वक़्त और यादों की जो बात कही, वह सीधे दिल में उतरती है। मैं भी कई बार किसी पुराने कमरे, सड़क या स्टेशन को याद करता हूँ और अचानक वही पुराना एहसास महसूस करता हूँ। आपकी पंक्तियाँ मुझे मेरे कॉलेज के दिन याद दिलाती हैं, जब एक साधारण सा बरामदा भी अपनेपन से भरा लगता था।

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